सोमवार, 28 सितंबर 2026

खोल भुजाएँ मिले गले [ गीतिका ]

 312/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोल       भुजाएँ     मिले   गले।

सत्य   यही   जब   उर   पिघले।।


दुनिया  में   छल - छद्म     बढ़ा,

उल्लू     सीधा   किया      चले।


नहीं     समझना     अपना-सा,

सभी   नहीं    नर-नारि     भले।


नजदीकी      में        देवी      वे,

गए    दूर     तो     बड़े     खले।


सोच-समझकर     करनी   कर,

मनुज    अन्यथा   हाथ     मले।


सड़क  नहीं      सीधी    दुनिया,

पता   नहीं   कब   कौन    छले।


'शुभम्'  दूध     से   जल    जाए,

रखे    फूँक   निज   पाँव - तले।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆10.30 प०मा०

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