312/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
खोल भुजाएँ मिले गले।
सत्य यही जब उर पिघले।।
दुनिया में छल - छद्म बढ़ा,
उल्लू सीधा किया चले।
नहीं समझना अपना-सा,
सभी नहीं नर-नारि भले।
नजदीकी में देवी वे,
गए दूर तो बड़े खले।
सोच-समझकर करनी कर,
मनुज अन्यथा हाथ मले।
सड़क नहीं सीधी दुनिया,
पता नहीं कब कौन छले।
'शुभम्' दूध से जल जाए,
रखे फूँक निज पाँव - तले।
शुभमस्तु,
27.09.2026◆10.30 प०मा०
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