311/2026
समांत : अले
पदांत : अपदांत
मात्राभार : 14.
मात्रा पतन :शून्य
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
खोल भुजाएँ मिले गले।
सत्य यही जब उर पिघले।।
दुनिया में छल - छद्म बढ़ा।
उल्लू सीधा किया चले।।
नहीं समझना अपना-सा।
सभी नहीं नर-नारि भले।।
नजदीकी में देवी वे।
गए दूर तो बड़े खले।।
सोच-समझकर करनी कर।
मनुज अन्यथा हाथ मले।।
सड़क नहीं सीधी दुनिया।
पता नहीं कब कौन छले।।
'शुभम्' दूध से जल जाए।
रखे फूँक निज पाँव - तले।।
शुभमस्तु,
27.09.2026◆10.30 प०मा०
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