314/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
ऊपर की इनकम आए,कोई मुर्गा फँस जाए।
जब ड्यूटी पर हम जाएं,कोई मुर्गा फँस जाए।।
सड़क हमारे बप्पा की, जाएगा क्यों कोई यों,
डंडे से वह थम जाए, कोई मुर्गा फँस जाए।
नज़र हमारी तेज बड़ी, कैसे कोई बचना है,
कभी अधिक धन कम लाए,कोई मुर्गा फँस जाए।
साँप बनाना रस्सी का, रोज हमारा काम यही,
कदम ताल छम- छम गाए,कोई मुर्गा फँस जाए।
यार बुरे हम दुश्मन भी, दूर-दूर ही रहना बे!
ज़रा न जोखम ले पाए, कोई मुर्गा फँस जाए।
ऐब न कोई शेष यहाँ,सदाचरण की बात न कर,
ढोल बजा ढमढम गाए, कोई मुर्गा फँस जाए।
'शुभम्' उठा हम लाशों को, टुकड़े-टुकड़े भरते हैं,
शेष रहम क्यों रह जाए, कोई मुर्गा फँस जाए।
शुभमस्तु,
28.09.2026 ◆3.00 प०मा०
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