310/ 2026
© शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
श्रद्धा भाव हृदय में आए।
मात-पिता गुरुजन को ध्याए।।
अपने पितरों को जो ध्याता।
सुख-संपति आजीवन पाता।।
आदर भक्ति अटल विश्वासी।
श्रद्धा रहे नित्य प्रति खासी।।
भक्त चरण में बन अनुरागी।
सत कर्मों का नित बड़ भागी।।
श्राद्ध पक्ष श्रद्धा का आया।
क्वार मास प्रभु ने महकाया।।
पितरों को तर्पण है करना।
दुग्ध सलिल तिल उन्हें अर्पना।।
जीवित मात-पिता की सेवा।
श्रद्धा से भर पाएँ मेवा।।
जीव-जंतु से नेह बढ़ाएं।
आन-मान सब बढ़कर पाएँ।।
श्रद्धा भाव घटाए दूरी।
उर-इच्छाएं होतीं पूरी।।
श्रद्धा का प्रसाद है मिलता।
यश का सुमन बाग में खिलता।।
श्रद्धा की सुगंध जो बाँटे।
मिलें न उसको पथ में काँटे।।
श्रद्धा से नतमस्तक होता।
खुले कृपा का झरना सोता।।
आओ 'शुभम्' बढ़ाएं श्रद्धा।
नहीं बड़ों के बनें विरुद्धा।।
श्रद्धावान जगत में जीता।
लिखे सत्य कर्मों की गीता।।
शुभमस्तु,
27.09.2026◆9.45प०मा०
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