शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

दो कानों की भी सुन लें 👂 [ व्यंग्य ]

 465/2022

 

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✍️ व्यंग्यकार ©

👂👂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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           तुम्हारे साथ हर समय रहने वाले ,सबकी  अच्छी  - बुरी सुनने वाले ;हम तुम्हारे ही दो कान हैं। आप ये मत समझें कि हम आपके मेहमान हैं।लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हमारा नहीं कोई मान - सम्मान है!हमारी भी अपनी एक पहचान है।हम तुम्हारे दिमाग़ के पड़ौसी भी हैं ,इसलिए हमें भी तो कुछ ज्ञान है।हमारा भी कुछ न कुछ स्वाभिमान है।तुम्हारी सब अच्छी- बुरी हरकतों; हरक़तों नहीं ,गतिविधियों का हमें पूरा - पूरा संज्ञान है।

          हमें किसी से कोई ईर्ष्या नहीं है।परंतु अपनी अनदेखी भी हमें सहन नहीं है। लगता है परमात्मा ने हमें किसी मृत्युभोज की बची हुई  पूड़ियों में से उठाकर दो सूखी हुई पिचकी-सी पूड़ियाँ यहाँ गालों के दोनों ओर चिपका दीं। उन्होंने हमारे हित के लिए कुछ अच्छा ही सोचा होगा, क्यों कि नहाते -धोते समय या वर्षा में भीगते समय वर्षाजल सीधे हमारे भीतर न चला जाए इसका पूरा - पूरा ध्यान रखा है। परन्तु शिकायत तो मुझे आपसे से है अर्थात आदमी से है। वह यह है कि आपने हमें लोहे या लकड़ी की खूँटी समझ लिया है। किसी की नेत्र दृष्टि कमजोर हुई या धूप में चश्मे की डंडियों को लिया और हमारे ऊपर टेक दिया।कभी आँखों ने कभी हमसे अनुमति ली या उसका आभार व्यक्त किया कि एक अनावश्यक बोझ हमारे ऊपर लाद दिया है ? नारियों ने अपने शृंगार के लिए झुमके, बालियां,लोंगें हमें छेद- छेद कर हमारे ऊपर ही टाँग डालीं! भला ये भी कोई बात हुई । सुंदरता में  नाम हो मुखड़े का और हम दोनों लद्दू घोड़े की तरह लादे जाएँ ? हर मुखांग का इतना शृंगार कि कान तो अंधे और बहरे हैं !आँखों के लिए काजल, नाक के लिए नथुनिया या लोंग, होठों के लिए लिपस्टिक, गालों के लिए गुलाबी रूज, पूरे मुखड़े पर पोतने के लिए क्रीम, जाड़े के अलग ,गर्मी की अलग औऱ हमारे ऊपर बोझ ही बोझ। भला यह कौन सा औचित्य है?

          मिस्त्री साहब को घुसेड़ने के लिए कानों के छेद ही मिले ,जो बचे हुए गुटके की गंदी और बदबूदार नशीली पुड़िया हमारे भीतर ही ठूँस डाली। टेलर मास्टर औऱ बढ़ई को भी  हमीं मिले और अपनी घिसी हुई पेंसिल का ठूँठ अटकाने के लिए हमारा ही हैंगर बना डाला!उधर आँख के अंधे नयन सुख नाई ने बाल काटते -काटते कैंची हमारे ही ऊपर चला डाली औऱ हमें लहूलुहान कर डाला।भला ये भी कोई बात हुई ? जब देखा तो थोड़ी सी डिटॉल की फुरहरी से हमें सहला दिया और च्च ! च्च!! करते हुए अफ़सोस जाहिर करने का नाटक करने लगा। ग्राहक भी तिलमिलाया ,पर क्या करता बेचारा ,उसने भी भूल समझकर ज्यादा मुँह नहीं खोला।

         पंडित जी ने भी अपने ज्ञान का सदुपयोग करने के लिए हमें ही पाया। अपने तीन धागों के जनेऊ को हमारे ऊपर ही टाँग दिया और लघु या दीर्घ शंका के समय हमारे ही ऊपर अंटा मार दिया।कभी कभी तो लोहे औऱ पीतल की चाबियों का गुच्छा ही हमारे ऊपर बोझ बना दिया ,नाम जनेऊ का और बोझ से मरें हम कान! वाह रे स्वार्थी इंसान! क्या इसीलिए  दिखाता है अपनी कोरी शान। कुछ स्वावलंबी भी बनना सीख। क्यों माँगता है हम कानों से मदद की भीख ? 

         बचपन में मास्टर जी ने भी हमें सताने में कोई कमी नहीं छोड़ी। कमजोर बच्चों के कान मरोड़कर ही उन्हें सदबुद्धि उलीच डाली। अब कहाँ तक कहें अपनी पीड़ा! गाली हो या ताली , गीत हो या पटाखों का विस्फ़ोट !सब हमें ही सुनना है। हम तो जैसे किसी गाड़ी की कोई फालतू एक्सेसरीज हैं , जिन्हें खोल कर फेंक दो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। परंतु एक बार भी क्या करके देखा ? करके देखो तो पता लग जाये कि कान का भी कुछ महत्त्वपूर्ण काम है ,उसके ऊपर क्यों लटका देते अनावश्यक झाम हैं? हमें तो आपके मुहावरों ने ही हमें कर रखा बदनाम है! कान का कच्चा होना, कान पकना, कान में तेल डालना, दीवारों के कान होना आदि आदि । अब आप ही सोचें कि यदि हम कच्चे होते  आप एक बैलगाड़ी का बोझ हमारे ऊपर लादकर नहीं चलते! यदि पक जाते तो क्या आपके खाने से बच पाते? हमें केवल एक मशीन , श्रवण यंत्र मात्र समझ रखा है, देह का अंग नहीं समझा ,इसलिए हममें तेल डालने की बात होती है। यदि दीवारों के कान हुआ करते तो हमारी ही क्या आवश्यकता रहती? ये सब सोचने की बातें हैं। पर सोचे कौन? बस अपना उल्लू सीधा हो जाए औऱ क्या !

        सुना है ।आप ही लोगों के मुँह से सुना है  कि  कहकर मन हलका हो जाता है। पर हमारे पास  तो न मुँह है औऱ न ही मन। फिर भी अपनी बात ,अपनी वेदना ,अपनी शिकायत ,आपकी शिकायत आपसे से करेंगे ,कहीं जा भी तो नहीं सकते;आप से ही करेंगे। कर ली। यदि आप पर कुछ असर पड़ा हो ,तो बताना ।आपके पास तो एक अदद मुँह भी है।हम गूँगे अवश्य हैं ,पर बहरे तो कदापि नहीं। जो कुछ कहा है , वह होगा भी सही।हम कान हैं कान, बात को धर लेना अपने ध्यान। दो भाई ।जिन्होंने आज तक कभी भी एक दूसरे को नहीं देखा।देखेंगे भी नहीं। 

🪴 शुभमस्तु !

04.11.2022◆ 8.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।


कान खोल सुन लें सभी 🦻🏻 [ दोहा ]

 466/2022


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✍️ शब्दकार ©

👂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जुड़वाँ   भ्राता कान हम, दाँए - बाँए  भाग।

सिर के  दोनों  ओर  दो, सुनते जीवन-राग।।

कान खोल सुन लें सभी,हम भी तन के अंग।

खूँटी  समझा   है  हमें, करते हैं  जन  तंग।।


नहीं   बोलते  कान हम, सबकी सुनते  बात।

गाली  -  ताली आपकी,रोना गाना    लात।।

कानों को मिलता नहीं, उचित कहीं सम्मान।

नाक नेत्र मुखड़ा सभी,दिखलाते निज शान।


लोंगें,   बाली    झूमते,  झुमके दोनों   ओर।

ख्याति मिली मुख को बड़ी,दुखें कान के पोर

चश्मे  की  दो  डंडियाँ,दीं कानों   पर  तान।

आँखों ने बल्ली  लगा,ऊँची कर  ली  शान।।


बचपन में ऐंठा हमें,किया खींच कर लाल।

मास्टर जी ने कान का,किया बुरा ही हाल।।

मिस्त्री की पुड़िया घुसी,गुटका  चाभे खूब।

हम  कानों   के  छेद में,गई गर्त  में   डूब।।


टेलर  खोंसे  पैन  या,पेंसिल कानों  बीच।

सुनना ही तो कान का,ये न काम था नीच।।

डाल   जनेऊ कान पर,पंडित बने   महान।

शंक निवारण के लिए,लिया गर्व से   तान।।


कान सुनें सबकी कही, करें न हम  पर गौर।

भली-बुरी  जो भी कहें,बुरा समय  का  दौर।।


🪴शुभमस्तु !


04.11.2022◆2.15 

पतनम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

हम हैं दो कान 🦻🏻 [ अतुकान्तिका ]

 464/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🦻🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हम हैं

 दो जुड़वाँ भाई कान,

हमें नहीं मिला

कभी भी उचित सम्मान,

किसी की तेरहवीं की

बची हुई दो

सूखी पूड़ियों की तरह,

चिपका दिया है

कपोलों पर

एक इधर 

दूसरा उधर।


हमने कभी भी

एक दूसरे को नहीं देखा,

कहीं नहीं बनी

हमारे मिलन की

भाग्य रेखा,

हमें बस समझ रखा है

टाँगने की खूँटी,

कभी चश्मे की डंडियाँ,

आँखों की क्या अदावत थी

जो अपना  

उल्लू सीधा करने को

हमारे ऊपर 

बोझा डाल दिया,

कभी मिस्त्री की

घिसी हुई 

पेंसिल की ठूँठी,

किसी ने गुटके की

बची हुई पुड़िया,

खोंस रखी है 

ढंग से बढ़िया।


हमारी कभी 

प्रशंसा नहीं होती,

होठों को लिपस्टिक,

आँखों को काजल,

गालों पर रूज,

मुखड़े पर क्रीम,

समझ में नहीं आई

हमारे कर्ता की थीम,

लटका दिए

हमें छेदकर 

झुमके और बालियाँ,

नाक में नथुनियाँ,

ललाट पर बिंदियाँ,

माँग में सिंदूर

चश्मे बद्ददूर!


 बजती हैं सदा

चेहरे की 

प्रशंसा में तालियाँ,

हमें तो पड़ती हैं 

सदा ही

गालियाँ,

कमजोर हुआ

 बालक तो

मास्टर जी हमें ही

मरोड़ देते हैं,

मजबूर होकर

हम सब कुछ

सहते हैं।

गूँगे जो हैं,

परन्तु बहरे तो नहीं।

बोल नहीं सकते 

तो क्या ! 

सुन तो सकते हैं!

गाली या ताली

भली या बुरी

सब हम ही

सुनते हैं।


हमने कभी कुछ

माँगा हो तो बताएँ,

और तो और

पंडित जी

को भी बड़ी दूर की सूझी,

हमारे ही ऊपर

लटका कर जनेऊ

अंटा मार दिया

किसी- किसी ने तो

चाबियों का गुच्छा भी

बाँध लिया!

तीन धागों का बोझ

औऱ ऊपर लाद दिया,

वैसे क्या हम

किसी लद्दू घोड़े से 

कम थे ?

जिनमें लोंगें कुंडलों से ही

हम दोनों ही

बेदम थे।


काटते - काटते बाल

वह हरजाई

हमें ही काट देता है,

च्च !च्च!!करते हुए

नाई भी 

हमें लात देता है,

डिटॉल चिपका के

पुचकार देता है,

पर हम जुड़वाँ 

कान भ्राताओं का जोड़ा

सब सहन कर लेता है।

क्या करें किसी गाड़ी

की अतिरिक्त एक्सेसरीज

की तरह कपोलों पर

चिपके रहना है,

दर्द और बोझ

सभी कुछ सहना है,

हम कान हैं 'शुभम्',

सब कान खोलकर 

हमारी भी सुन लें।


🪴 शुभमस्तु !


03.11.2022◆3.15 

पतनम मार्तण्डस्य।

बँगले ऊँघ रहे हैं! 🏘️ [ गीत ]

 463/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🏘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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झोपड़ियों  में  आग  लगी  है,

बँगले ऊँघ रहे हैं!


तन ढँकने  को  वसन  नहीं है,

 नहीं  उदर  में  रोटी।

धूप   झाँकती   झोपड़ियों  में,

खेल रही  नौ गोटी।।

भीतर  सुलगे   ज्वाला।

जुबाँ - जुबाँ पर भाला।।

करनी   नहीं    देखते  अपनी,

 बीड़ी धूंक  रहे हैं।


हाथी   जाते     अपनी   राहें,

पीछे  कूकर  भूँकें।

अवसर  मिलते   ही टाँगों में,

क्योंकर वे सब चूकें।।

उर  में   समता   चाहें।

उठा  - उठा कर  बाँहें।।

गज - शुंडी  में  घुसने के हित,

चींटे  सूँघ  रहे  हैं।


कारण  बिना   बैर  बँगले  से,

फूस न देखा अपना।

इतराती    झोंपड़ - पट्टी   ये,

महलों का है सपना।।

मनहूसी मुख छाई।

टूटे लोग - लुगाई।।

अंबर   से  हो  धन  की वर्षा,

सरपट घूम रहे हैं।


ककड़ी  का रसाल हो जाना,

सदा असम्भव भारी।

मासी   तो   मासी   ही  होगी,

नहीं जननि महतारी।।

विधि-विधान स्वीकारें।

अपने को  क्यों  मारें!!

कर्मलेख  मिटता  न  मिटाए,

पत्रा बूझ रहे हैं।


🪴शुभमस्तु !


03.11.2022◆1.45

 पतनम मार्तण्डस्य।


काव्य -अंगना आँगन में 🏕️ [ गीत ]

 462/2022


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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नारी  की  छाया  बन  घूमें,

काव्य-अंगना-आँगन में।


कभी अधर  का चुम्बन भाए,

कभी झनकती पग पायल।

कभी   मोहते   गाल  गुलाबी,

उर को करते अति घायल।।

बिंदी   लाल   सुहाती।

केशराशि बल खाती।।

कानों के  झुमके  नक नथनी,

रस बरसाते फ़ागुन में।


दस   रस  के   स्थाई  दस ही,

संचारी     तैंतीस   बिसार।

बस रति का  शृंगार  दीखता,

नहीं वीर शम विस्मय धार।।

क्षीणकाय कटि, छाती।

तन में    आग  लगाती।।

विरह   और   संयोग दीखता,

चाँद रूप का आनन में।


रीतिकाल   ने  छिलके  फेंके,

उनमें ही रस पाते हैं।

नीतिकाल दिखता न उन्हें तो,

गीत देह के गाते हैं।।

देश भक्ति क्यों भाए।

रमणी  पर  उतराए।।

परिरम्भण मर्दन ही सब कुछ,

शृंगारी रस -प्लावन में।


कवयित्री  को   साजन  प्रेमी,

विरह 'शुभम्' संयोग दिखे।

उसकी सीमा है  बस तन की,

देश भक्ति क्यों आज लिखे??

सीमा पर रिपु भारी।

बने नित्य   बीमारी।।

वीरों   का     उत्साह   बढ़ाएँ,

भरें जोश हर दामन में।


🪴 शुभमस्तु !

03.11.2022◆11.00 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

बुधवार, 2 नवंबर 2022

कान -उवाच 👂 [ कुंडलिया ]

 461/2022

     

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✍️ शब्दकार ©

👂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                          -1-

भाई  हम दो कान हैं,सुनें खोल सब   कान।

इधर-उधर चिपके हुए,हमें न मिलता मान।।

हमें न मिलता मान,काम बस सुनना-सुनना

गाली  ताली  भली, बुरी बातों से   बिंधना।।

'शुभम्' हमें  है शाप,भले हों लोग  - लुगाई।

देखा क्या पल एक, परस्पर हम  दो  भाई??


                         -2-

भाई हम  हैं कान दो,डाला हम पर  भार।

बोझ  बढ़ा  खूँटी बने,करते पर -उपकार।।

करते  पर-उपकार, डंडियाँ चश्मे   वाली।

आँखों ने क्या खूब,अदावत आज निकाली

'शुभम्' लाद दीं कान,युगल जोड़ी पछताई।

विधि  का यही  विधान,वेदना झेलो  भाई।।


                         -3-

सबने  आँखों  होठ का,खूब किया  शृंगार।

बाली झुमकों का पड़ा, हम कानों पर भार।।

हम कानों पर भार, नाम मुखड़े का  होता।

आँसू से भी हीन, युगल चुपचुप  ही  रोता।।

'शुभम्' कहें निज पीर,आँख से बहते झरने।

करता है मुख हाय, कामना की शुभ सबने।।


                        -4-

घोड़ा   लद्दू   जानकर,  हमें सताएँ   खूब।

मास्टर जी  भी  ऐंठते, ज्यों पैरों तल  दूब।।

ज्यों पैरों तल दूब,लटकतीं झुमके  बाली।

छिदते हम दो कान,समझकर चोर मवाली।।

मुख की गाएँ कीर्ति,सदा हमको  ही मोड़ा।

'शुभम्' न कोई माँग, नहीं हम लद्दू   घोड़ा।।


                          -5-

माना  बस  गूँगा  गया,नहीं बोलते   कान।

सुनते सब अच्छी बुरी,गाली, ताली,  गान।।

गाली,  ताली,  गान, रहें आगे जो    बकते।

देखो  दोनों  नेत्र,  इधर   से उधर  सिहरते।।

'शुभम्'  वक्र आकार,रूप भी एँचकताना।

मृत्युभोज  की  शेष, पूड़ियाँ हमको माना।।


                         -6-

माना  बस  एक्सेसरी, समझा तुच्छ   उपांग।

जो न परस्पर देखते, चिपकाया   है  सांग।।

चिपकाया  है   सांग,ठूँस लेता है     पुड़िया।

मिस्त्री गुटका कान,घुसाकर ढँग से बढ़िया।।

पेंसिल  का  भी ठूँठ, खोंसता दर्जी   जाना।

टाँग  जनेऊ  सूत्र, पंडितों ने क्या    माना!!


                         -7-

सबका  ही शृंगार  कर,किए उपेक्षित  कान।

आँखों में काजल सजा, अधरों पर मुस्कान

अधरों पर  मुस्कान, लगाई नकली  लाली।

मुखड़ा चुपड़े क्रीम,सुवासित त्वचा निराली

'शुभम्' गुलाबी गाल,रूज से जाना सदका।

सुनते हैं सब कान,कान से ही हित सबका।।


🪴शुभमस्तु !


02.10.2022◆3.00पतनम मार्तण्डस्य।



कर्म सदा अक्षत रहें 🌳 [ दोहा ]

 460/2022


[इच्छा,नवमी,पूजा,अक्षत,उपवास]

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✍️ शब्दकार©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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       ☘️ सब में एक ☘️

पर्वत-सी इच्छा बड़ी, बढ़ती  रहे  अनंत।

कर्म नहीं अनुकूल तो, होता उसका अंत।।

अपने कद-अनुरूप ही,इच्छा पालें  मीत।

स्वप्न असंभव  देखता, कैसे होगी  जीत!!


अक्षय नवमी पावनी, करें सुजन उपवास।

पूज रोचनी  वृक्ष  को,करें निरोगी  आस।।

अक्षय नवमी को किया,क्रूर कंस का अंत।

मथुरा में श्रीकृष्ण ने,रुक्मणि सत्या कंत।।


जो संतति पूजा करे,जनक जननि की नित्य

वही भक्त भगवान का,धर्म- कर्म  औचित्य।।

पूजा,जप,तप है वृथा,यदि न दिया सम्मान।

गुरु या जननी जनक को,हने वचन कटु बान


कर्म  सदा अक्षत रहें,फल के रूप हजार।

वही  योनि आधार है,बदले तन  आकार।।

अक्षर  अक्षत  ब्रह्म   है,बोलें वाणी    नेक।

उर को  घात न दीजिए,रहें सदा  सविवेक।।


सेवारत जो सुत रहे,जनक- जननि के पास।

वही  तपस्या धर्म है,  सर्वोत्तम  उपवास।।

वसन रँगे होता नहीं, धर्म, भक्ति, उपवास।

आडंबर  है  मूढ़ता, चले देश- हित   श्वास।।


      ☘️ एक में सब ☘️

इच्छा  नवमी को  करें,

                         अकरा तरु के    पास।

पूजा  अक्षत  कर  लिए,

                         पावन   मन उपवास।।


🪴शुभमस्तु !


02.11.2022◆6.00 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...