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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
सोने पर डाका पड़ा, देख रहा है देश।
धरे देह पर आवरण, पीत सुनहरे वेश।।
पीत सुनहरे वेश, दान की करते चोरी।
किधर बचेंगे साँप, निकल कर अंधी मोरी।।
'शुभम्' अयोध्या धाम, छिपेंगे वे किस कोने।
होना ही है आम, राम के पचें न सोने।।
-2-
अंदर मंदिर के छिपे, राम-दान के चोर।
खेले खेल करोड़ के, मन में भरें हिलोर।।
मन में भरें हिलोर, हुए चंपत बहुतेरे।
जीजा - साले भेक, लिए मंदिर को घेरे।।
'शुभम्' बहाना एक, ले गए होंगे बंदर।
हैं डकैत सिरमौर, गणक मंदिर के अंदर।।
-3-
राम-दाम की लूट का, नया नहीं यह खेल।
जहाँ व्यवस्था भंग हो, चलती रेलमपेल।।
चलती रेलमपेल, मित्र संबंधी लाकर।
खूँदी खांड अतोल, कढ़ाई में सिर पाकर।।
'शुभम्' अयोध्या धाम, नहीं यह लूट राम की।
कालिख़ लगी अकूत, लूट यह राम-दाम की।।
-4-
दर्शन करते राम के, डाकू चोर असंत।
साधु संत प्रभु भक्त भी, चोरी करें महंत।।
चोरी करें महंत, नहीं बाहर से आए।
डंसते बिल के साँप, नोट गिनते जो पाए।।
'शुभम्' न भय लवलेश,रोक या टोक न वर्जन।
नहीं एक भी चोर, करें जो प्रभु के दर्शन।।
-5-
होना ही है एक दिन, शुद्ध दूध का दूध।
अलग-थलग पानी रहे, विमल अयोध्या सूध।।
विमल अयोध्या सूध, दान-धन सोना हीरे।
गणक बोलते झूठ , खड़े सरयू के तीरे।।
'शुभम्' एक दिन भेद, खुलेगा पड़ना रोना।
जो बोया है बीज, फसल का जो फल होना।।
शुभमस्तु,
21.06.2026◆ 8.30 आ०मा०
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