207/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
योगी वेश धरे बहु भोगी।
धर्म - कर्म के हैं सब रोगी।।
नहीं योग की भाषा जानें।
हठ की चादर तन पर तानें।।
योगी का तप कठिन साधना।
सबके वश का नहीं नाथना।।
वन बीहड़ पर्वत पर जाते।
बड़ी गुफा में बसे सुहाते।।
कृषक देश का साधक भारी।
करे साधना स्वेद सँवारी।।
समझें कृषक नहीं है योगी।
करे कर्म कृषि रहे निरोगी।।
घूम रहे हैं पहन गेरुआ।
ज्यों गलियों में फिरें फेरुआ।।
नहीं समझना योगी सबको ।
परखें उनके दैनिक ढब को।।
जानें नहीं योग-परिभाषा।
सदा भोग रंजित अभिलाषा।।
स्वाद ढूंढ़ते भोजन माँहीं।
कामिनि चले साथ ज्यों छाँहीं।।
ध्यान योग में रमता योगी।
कर्म योग में निरत निरोगी।।
योगाचरण जीव की शैली।
विषय भोगरत तन-मन थैली।।
एक दिवस में योग न आता।
छद्म नाट्य कर नर पछताता।।
करे साधना जो आजीवन।
योगी की क्यों उधड़े सीवन??
शुभमस्तु,
22.06.2026◆12.30 प०मा०
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