205/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दाना नहीं दान खाया।
राम का सम्मान खाया।।
चुग गए हैं काग मोती,
देश का संज्ञान खाया।
आए नहीं डाकू कहीं से,
धर्म का गुणगान खाया।
हाथ की ऐसी सफाई,
देख ली चुपचान खाया।
नाग हैं बैठे बिलों पर,
सुप्त अंतर्ध्यान खाया।
कौन कहता चोर हूँ मैं ,
आस्था का कान खाया।
मलिन सरयू हो गई है,
भक्ति भाविल भान खाया।
खेत खाया बाड़ ने ही,
पुण्य का बिरबान खाया।
अब करें विश्वास किसका,
राष्ट्र का उपधान खाया।
शुभमस्तु,
22.06.2026◆7.00आ०मा०
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