मंगलवार, 23 जून 2026

धरती के शृंगार:वृक्ष [ कुंडलिया ]

 194/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

धरती      के     शृंगार    हैं, घास   लताएँ   वृक्ष।

अनुपम  शोभा    सोहती, तना  मनुज का  वक्ष।।

तना मनुज का वक्ष,विविध फल  लगते उन पर।

पोषक   से   भरपूर,  विटामिन  के हैं  तरु घर।।

'शुभम्'    लगाएँ   आप,अन्यथा  जगती मरती।

वृक्ष   न    काटें   एक,  तभी  हँसती   है धरती।।


                         -2-

करते     हैं    मानव  नहीं,   देखभाल भरपूर।

वृक्ष    नहीं    पनपें   धरा,  रहें  अहं  से चूर।।

रहें    अहं    से   चूर,   लगाते   बाड़  न पानी।

फोटो    में    मदमस्त, बने   नर   राजा- रानी।।

'शुभम्'   सूखते   पेड़,धूप में      जलते-मरते।

स्वार्थलिप्त   मनुजात,  नहीं  तरु-सेवा करते।।


                         -3-

नेता    भाषण   में   कहें,   खूब लगाओ   वृक्ष।

छायाचित्रों     में   लगे,   सब    नेता    हैं दक्ष।।

सब   नेता   हैं   दक्ष, सभी   अखबार भरे   हैं।

नहीं    देखता    एक, लगे    वे   वृक्ष   हरे   हैं??

'शुभम्' सभी शुभ श्रेय,  शीश   पर अपने लेता।

जनता    तो    बस   भेड़,  हुर्रते   उसको नेता।।


                         -4-

केला     जामुन     संतरा,   मधुर  रसीले  आम।

खरबूजा    तरबूज   का,  अलग  खेत में काम।।

अलग खेत   में   काम, बाग   में  लटकीं कीवी।

चीकू    करें    कमाल,  खुली   किन्नू  की  नीवी।।

'शुभम्'  फलों   के  वृक्ष,  लगाते   मह-मह मेला।

विविध   स्वाद   के   स्रोत, संतरा  जामुन केला।।


                         -5-

सावन    आया     झूम   के,  अमराई  में  आम।

वृक्ष    सभी    खुशहाल  हैं,   झूले   पड़े ललाम।।

झूले   पड़े    ललाम,   झूलतीं   जिन  पर राधा।

संग   झूलते    श्याम,   न  पड़ती  पल को  बाधा।।

'शुभम्'    गोपियाँ-गोप,    लगाते    झोंटे पावन।

झीनी    पड़ें    फुहार,  बाग   में    सरसे सावन।।


शुभमस्तु,

19.06.2026◆5.30 आ०मा०

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