गुरुवार, 25 जून 2026

सारी दाल हो गई काली [ गीत ]

 211/2026

 

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नहीं दाल में

 काला

सारी दाल हो गई काली।


राम दान के

सभी लुटेरे

पहने पीत चदरिया

तिलक लगाए

रामचन्द्र का

बसते औध नगरिया

राम पाँव के

तले पड़ा है

डाका जगत सवाली।


खूँदी खांड़

स्वाद भर खाई

गोबर में कुछ गाड़ी

जान गए सब

खेत खा गई

लगी हुई जो बाड़ी

होटल भवन

महल चुनवाये

बजा रहे घर ताली।


आया ऊँट

पहाड़ तले जब

सारी पोल खुली है

जातिवाद 

सम्बंधी मित्रों 

सबकी मिली जुली है

केले की

पर्तें-सी खुलती

लोग बजाएँ ताली।


ऊपर से

नीचे तक सबके

मुख पर लगे मुखौटे

सबकी सब

जानते कहानी

लिए कनक घर लौटे

हीरा मोती

स्वर्ण रजत की

बहती छत परनाली।


बगुला भगत

बड़े ही भोले

कौन चोर कह पाए

भैंस सहित

खोया कर खाते

जगत उन्हें सिर नाए

दर्शक भक्तों पर

रंगियों ने

अजब मोहिनी डाली।


शुभमस्तु,

25.06.2026◆6.30 आ०मा०

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