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विधान :यमाता यमाता
ISS ISS : 06 वर्ण।
दो चरण तुकांत।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हुई एक चोरी।
ठगों की ठगौरी।।
अयोध्या ठगी है।
नहीं दिल्लगी है।।
चुराया गया है।
न ये भी नया है।।
नहीं दान पेटी।
हुई रार हेटी।।
चढ़ा था जु सोना।
हुआ है न होना।।
धरा में समाया?
गणों ने चबाया??
बताए न कोई।
दुनैना भिगोई।।
कहाँ दान खाया?
घरों में छिपाया!!
लगा शीश टीका।
दिखा काम नीका।।
बड़ा रॉब झाड़े।
करे काम आड़े।।
जपे राम सीता।
पढ़े नित्य गीता।।
यही नीति धर्मी।
बने वे कुकर्मी।।
चुरा स्वर्ण हीरा।
बने मूढ़ कीरा।।
मिले नाग योनी।
यही भाग होनी।।
शुभमस्तु,
21.06.2026◆5.00प०मा०
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