210/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
न दे गरीबी
कभी विधाता
तरस-तरस मन जाए।
नहीं देह पर
वसन ढंकें जो
सुत-माता दुखियारे
नहीं आँत में
भोजन पानी
दिखते दीन बिचारे
मदद नहीं
करता जन कोई
मन किस पर पतियाये।
देख रहीं
ललचाई आँखें
काश हमें मिल जाता
एक वक्त तो
शुष्क देह में
भोजन उदर समाता
कैसे प्रभु का
भजन करे मुख
गीत राम के गाए।
नहीं माँगना आता
भोजन
मांगे बिना न मिलता
बिना पाँव पर
खड़े हुए तो
फूल खुशी का खिलता
जितना सोचें
'शुभम्' जिंदगी
उतनी ही उलझाए।
शुभमस्तु,
23.06.2026◆10.15 आ०मा०
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