196/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
छिपे अयोध्या धाम में,राम-दाम के चोर।
स्वर्णहार प्रभु-पादुका, नहीं ले गए मोर।।
मंदिर है प्रभु राम का, माल उड़ाएं चोर।
राम-दान की लूट का, खोज रहे हैं छोर।।
गिनते-गिनते नोट वे, उड़ा ले गए दान।
धुले दूध के वे रहे, हुई नहीं पहचान।।
लाखों लाख करोड़ की, खड़ीं कोठियाँ देख।
शंकित है मन देश का, दिखे मीन में मेख।।
देवालय दूषित किया, मूँछ रहे वे तान।
ऑटो से अर्जित सभी,कोठी बंगला शान।।
मित्र सगे सम्बंध के,भरे गणक सुविचार।
पूर्व नियोजित योजना, लगती है साकार।।
जाँचें भी जारी सभी, मिले न रँगे सियार।
राज्य प्रमुख आश्वत हैं,पकड़ें चोर अवार।।
राम क्षमा करते नहीं, कर्ता भोगे भोग।
हया न आई आँख में, मात्र नहीं संयोग।।
पावन मंदिर राम का, चुरा चढ़ावा आज।
दूषित है मन चोर का, किया पाप का काज।।
राम-भक्त हलकान हैं, देख व्यवस्था दंग।
अंधा बाँटे रेवड़ी, चोर नहाएँ गंग।।
कलयुग में प्रभु राम के,दूषित कर आदर्श।
गणक चोर डाकू सभी, झाड़ रहे हैं फर्श।।
शुभमस्तु,
21.06.2026◆9.30 आ०मा०
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