203/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कथन सरल ये शुभ समता हो।
यहाँ-वहाँ नित समरसता हो।।
ग्रीवा नहीं झाँकता अपनी,
जिसने कर दी बड़ी खता हो।
हमने चाहा है हित सबका,
दुष्कर्मों को कहें धता हो।
वैमनस्य हो नहीं धरा पर,
सबको निज कर्तव्य पता हो।
सुमन खिलें कलियाँ मुस्काएँ,
रहे झूमती हरित लता हो।
पतन चरित का हो न किसी का,
जीवन में दृढ़ नैतिकता हो।
'शुभम्' देश के लिए जिएं हम,
चाल-चलन में शुचि शुभता हो।
शुभमस्तु,
22.06.2026◆4.30आ०मा०
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