सोमवार, 20 जुलाई 2020

मेह न बरसा [ बालगीत ]

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✍ शब्दकार©
🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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वर्षा  ऋतु   है मेह  न  बरसा।
जन-जन बूँद- बूँद को तरसा।

काले   बादल   हमें    डराते।
नहीं  बूँद   पानी    बरसाते।।
बरसे  पानी    बीता अरसा।
वर्षा ऋतु है   मेह न बरसा।।

बरसा   होता    खूब  नहाते।
कागज़ की हम नाव बहाते।।
लगता हमें  न कोई डर -सा।
वर्षा ऋतु है   मेह न बरसा।।

मोर   पपीहा   कोयल प्यासे।
हरे  खिल   रहे  पेड़ जवासे।।
कोई  जीव नहीं   है   हरसा।
वर्षा ऋतु है   मेह  न बरसा।।

झूठी   कविता  है सावन की।
जब तक झड़ी नहीं पावन सी।
अवा सुलगता लगे न घर सा।
वर्षा  ऋतु  है  मेह न बरसा।।

रुके   पड़े    हैं  नाले - नाली।
चली  नहीं है  अभी पनाली।।
कैसे    जाएँ   पढ़ें    मदरसा।
वर्षा ऋतु   है  मेह न बरसा।।

कैसे     आएगी    हरियाली।
सूखी धरती   डाली -डाली।।
धूल उड़ रही लगा न झर सा।
वर्षा   ऋतु  है मेह न बरसा।।

💐 शुभमस्तु!

19.07.2020 ◆5.00 अप.

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