गुरुवार, 24 नवंबर 2022

निज गरेबान में झाँकें [ गीत ]

 494/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

अपने - अपने  गरेबान  में,

नर-नारी सब झाँकें।


नंगा  होकर  खड़ा  आदमी,

अति आधुनिक बताए।

स्नानागार  और   के   झाँके,

मौन खड़ा मुस्काए।।

विकट फँसी है नारी।

कहते नर पर भारी।।

गली - गली  में दुःशासन  हैं,

ग्रीवा उचका ताकें।


जोड़  - जोड़ श्रद्धा के टुकड़े,

श्रद्धा   लौट  न पाती।

पूछें उसके   मात  - पिता  से,

फटती जिनकी छाती।।

हुआ हवस का खेला।

वह जाने  जो झेला।।

भूत  आधुनिकता  का  हावी,

सुन-सुन श्रुतियाँ थाकें।


सबके   जीवन   में  चलती हैं,

यौवन - गंध- हवाएँ। 

चलती  हैं  जब  तेज  सुनामी,

टूटें   मन  - वल्गाएँ।।

अंधे     दौड़ें     घोड़े।

सहज रास को तोड़े।।

पत्थर  गिरे अक्ल पर जब से,

छाने फिरते खाकें।


कलयुग में क्या-क्या होना है,

दिखता नित्य नमूना।

नौ   महीने  जो  रखे कोख में,

लगता उसको चूना।।

द्रवित हृदय रोता है।

जब ऐसा होता है।।

'शुभम्' नारि- नर के चरित्र का,

दर्शन कर दृग पाकें।


🪴शुभमस्तु !


23.11.2022◆8.45 पतनम मार्तण्डस्य।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...