बुधवार, 30 सितंबर 2026

ताप रहे अगियाने पर [ गीत ]

 316/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उतरी रात 

पेड़ के नीचे

 ताप रहे  अगियाने पर।


हमजोली

कुछ संगी-साथी

गुड़-गुड़ करते हैं हुक्का

कोई किस्सा

सुना रहा है

कोई लगा   रहा  तुक्का

एक नहीं

दो -दो हुक्कों को

बैठे लिए बिछाने पर।


नम्बरदार

खाट पर सोहें

बिछा चटाई कुछ बैठे

लगता है

जाड़े की रातें

नहीं भाव उनके ऐंठे

बातों में

मशगूल सभी हैं

याद नहीं जाएँ अपने घर।


घनी छाँव 

बरगद की ऐसी

रजनी रानी आई है

दीप एक जलता

खटिया पर

रजनी भी शरमाई है

बाँधे हुए 

शीश पर अपने

गमछे कान पिराने पर।


शुभमस्तु,


29.09.2026 ◆7.00 आ०मा०

              ◆●◆

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