सोमवार, 24 अगस्त 2026

यही तपस्या आज हुआ [ गीत ]

 270/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भारी बोझ 

रखा कंधों पर

यही तपस्या आज हुआ।


पढ़ना-लिखना

ज्ञान बढ़ाना

नहीं कभी भी जाना

शिक्षित बन कर

पद पा लेना

कभी  नहीं  पहचाना

उस काँवरिया पर

फूल बरसना

जिनके सिर का ताज हुआ।


पिछड़े दबे-कुचे

यदि ये जन

यदि ऊपर चढ़ जाएँ

शासन करें

हमारे ऊपर

सब ऊपर बढ़ जाएँ

इनका पढ़ना-लिखना

हमको 

आज समस्या, खुदा कुआ।


भुना रहे हैं

नाम धर्म का

अगड़ों की ये बड़ी सियासत

काँवरिया को

प्रेरित करते

किंचित ये ही बने विरासत

बड़े बड़े 

नेता भी खुश हैं

पुत्र लगाओ दाँव जुआ।


पुलिस अधीक्षक

जिलाधिकारी

सब अगड़ों के नाम लिखे

दौड़ रहा हो

यदि पिछड़ा तो

मार टंगड़ी  ,  गिरे दिखे

जिसने 

कूटनीति ये समझी

छोड़ी काँवर लक्ष्य छुआ।


यादव लोधी

पाल बघेले

कुर्मी नाई  काँवरिया

शर्मा गुप्ता

ठाकुर जी क्या

बनते ऐसे बावरिया

वे शासक 

ये शासित सारे

देखो कैसा लाड़ चुआ!


शुभमस्तु,


23.08.2026◆7.00आ०मा०

                    ◆●◆

स्त्री थीं,मिस्त्री हो गईं! [ अतुकांतिका ]

 269/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऐसे-ऐसे कारीगर

देख लीजिए हर घर-घर

जो बिना ईंट पत्थर

दीवारें खड़ी करें

सुख चैन भी हरें

दिलों के बीच में।


ब्याह जब नहीं हुआ

वे भाई- भाई थे

रक्षक थे सिपाही थे,

हो गया जब ब्याह

तो मिट गई प्रेम की चाह

रात -दिन बस आह!

कारीगर जो आ गई

बँटवारे की

दीवार खड़ी करने,

सुख - शांति को हरने।


बिखर गया ठाठ-बाट

मिट गई टूटी खाट

कारीगर पलंगासीन है

बेलदार बेचारा पति

बड़ा ही दीन है,

ये व्यवस्था आधुनिक है

नवीन है।


सोहनी की सींक-सींक 

बिखर गई,

तो घर को बुहारे कौन,

सभी पड़े  विवश  मौन,

पत्तों से भर गया लॉन।


पूजनीया देवियाँ

दीवार खड़ी करने के लिए

स्त्री थीं,  मिस्त्री हो गईं,

घर की एकता अखंडता

खण्ड- खण्ड  रो रही।


संगठन बिखर गया

जिंदा जन मर गया

घर आँगन अखाड़ा है

गर्मी या जाड़ा है

हर ओर वैमनस्य ने

लाल ध्वज गाड़ा है।


21.08.2026◆8.15आ०मा०

                 ◆●◆

सब चूल्हे कच्ची माटी के [ अतुकांतिका ]

 267/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शादी से पहले

राखी बंधन त्योहार

भाई -बहन का प्यार,

बरसता हुआ लाड़,

खड़ा प्रेम का पहाड़।


शादी के बाद

सास-ससुरे से रार

देवर से जेठ पर प्रहार

आँगन के बीच खड़ी

ऊँची लंबी दीवार।


नव रात्रि की देवियाँ

विदा देवित्व हुआ,

ससुरालय में 

बँटवारे का

 खुदवा दिया कुँआ।


मानो या न मानो

कारण केवल एक,

अतीत की देवी हुई

बंटाढार की चुड़ैल।


अब नहीं रहा 

भाई भाई में प्रेम,

बो रहीं पत्नियाँ

कानों में वहम,

भाड़ में जाएँ 

सास-ससुर

देवर ननद जेठ,

वैमनस्य का बीज-वपन

नारी कर्म श्रेष्ठ।


गार्हस्थ के महाभारत का

मूल विवाहिता नारी,

प्रेम की दुश्मन 

पैनी छुरी आरी,

न मानो तो

घर-घर में देख लो,

सभी चूल्हे 

द्रव पेट्रोलियम गैस पर

दिखते हैं स्टील के,

पर कच्ची माटी के 

बने हैं।


शुभमस्तु,


20.08.2026◆6.15 प०मा०

                  ◆●◆

जलधर [ कुंडलिया ]

 268/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

सागर से लेकर चले,जलधर जल-आगार।

सुख देने जल-वृष्टि से,विपुल लुटाने प्यार।।

विपुल लुटाने प्यार,प्यास जीवों की हरते।

मानव जलचर जंतु,विटप की सेवा करते।।

'शुभम्' महत् उपकार,सृष्टि में करें उजागर।

अभिसिंचन के हेतु, नीर के उड़ते सागर।।


                         -2-

महिमा जलधर की सदा,सत्य कहें कवि लोग।

खुले    गगन  में   घूमते, करें    रात-दिन योग।।

करें रात-दिन  योग,  कहें   हम  उनको योगी।

पर उपकारी   मेघ,  नहीं   विचरण   के रोगी।।

'शुभम्'   देव  पर्जन्य,  नहीं   है   इनकी उपमा।

वे   जगती  के  प्राण,करे  जग जलधर महिमा।।


                         -3-

विरही   यक्ष  कुबेर   का,  हुआ प्रिया से दूर।

त्यागी   निज अलकापुरी, दुखी हृदय मजबूर।।

दुखी   हृदय मजबूर,एक दिन जलधर आए।

दिया   विरह-संदेश,  गगन   में   जो मँडराए।।

'शुभम्'  किया स्वीकार, मेघ ने प्रेम बतकही।

सुनी   यक्ष   की   बात,दंड   का भागी विरही।।


                         -4-

बरसे  जलधर   व्योम से,  धारासार अपार।

नदियाँ उमड़ी   वेग   से,करतीं जग उपकार।।

करतीं जग  उपकार,  कहीं हैं बाढ़ भयंकर।

काँवरधारी  लोग,चढ़ाते  जल शिव शंकर।।

'शुभम्'  बहे कुछ  गाँव,नगरवासी सब हरसे।

जलधर के  उपकार, विविध  रूपों  में बरसे।।


                           -5-

गरजे   जलधर   व्योम   में,तड़पी तड़ित अधीर।

रजनी   में     भर     दिव्यता,   बरसाते सन्नीर।।

बरसाते       सन्नीर,     ताल     में   दादुर बोले।

टर्र-टर्र     का   साज,  सजा  अपना  मुख  खोले।।

'शुभम्' मत्स्य साम्राज्य,किसी को क्योंकर बरजे।

श्रावण का   शुभ   मास, गगन  में जलधर गरजे।।


शुभमस्तु,


21.08.2026◆ 6.30आ०मा०

                     ◆●◆

राह रपटीली है [ नवगीत ]


266/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह की गैल से

दिल का सफर 

राह रपटीली हैं।


आँख से

आँख की 

मौन बतियाँ हुईं

गिर गए

नेत्र- अंचल

कहानियाँ नई

गुलाबी 

कपोलों की

रंगत सजीली है।


पहली  ही नजर

ढह गया है कहर

क्या करें क्या कहें

चैन आए नहीं

कोई भाए नहीं

कष्ट   कैसे   सहें

दर्द दिल में बसा

देख जग ये हँसा

अँखियाँ पनीली हैं।


अनजाना सफर

चल पड़ा इस कदर

ज्ञात मंजिल नहीं

हाथ में हाथ है

अजनबी साथ है

पहुँचेंगे कहीं

डूबती नाव को

एक तिनका मिला

नीम चीनी है।


शुभमस्तु,


20.08.2026◆ 12.15 प०मा०

                 ◆●◆


कीचड़ में सनते युगल पाँव [ गीत ]

 265/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पढ़ने जातीं

गणवेश पहन

कीचड़ में सनते युगल पाँव।


भारत का 

देखो नव विकास

सड़कें टूटी

झेलते नित्य

जो सर्वनाश

किस्मत फूटी

जा रहे समेटे विद्यालय

निज वस्त्र

लगाए भाग्य दाँव।


भारी भरकम

लादे बस्ते

है नील वेश

स्कर्ट बचाएँ

वे कैसे

है यही देश

नेता कहते

विकसित

भारत के सभी गाँव।


चलने भर को भी

नहीं गैल

जिनको  कोई

पग-पग पर

पिछड़ी मानवता

हर क्षण रोई

झूठे वादों की

लगी 

वोट की काँव-काँव।


शुभमस्तु,


18.08.2026 ◆6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

बख़्सवानी थीं नमाजें [ गीतिका ]

 264/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बख्शवानी  थीं   नमाजें ,पड़  गए  रोज़े गले।

रात-दिन बढ़तीं न खाजें,जदपि हैं जिंदा भले।।


आदमी को चैन कब है, कोसता   है   गैर को,

झेलता संकट हजारों , शाम   का  सूरज ढले।


उठ रहीं अँगुली   हजारों, तर्जनी सविरोध  की,

जदपि  दुःखों में तड़पता, आदमी खुद को छले।


आदमी   को देश की, चिंता   नहीं  पल एक  भी,

दूसरे  की  हर तरक्की, आँख   में  उसकी खले।


खुदगर्ज़गी  का देख आलम, जान का खतरा बढ़ा,

साथ  में   कोई   किसी  के, हाथ  क्यों थामे   चले।


जीभ   से  पानी  टपकता,माल औरों का हड़प,

पाँव से नीचे  भले  निज,आदमी  जन को दले।


जुगुनुओं   की   ले  मशालें,आदमी  मैं  खोजता,

पर 'शुभम्'  पाया  न कोई,हवन में कर भी जले।


शुभमस्तु,


17.08.2026◆5.00आ०मा०

                  ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...