गुरुवार, 29 जुलाई 2021

गरजे भी बरसे भी! ⛈️ [ अतुकान्तिका]

 

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✍️ शब्दकार©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अब तक गरज रहे थे,

खूब गरजे,

अब बरस भी रहे हैं,

सिद्ध कर दी कहावत

पूरी तरह ग़लत,

कि बरसते नहीं हैं

गरजने वाले।


गर्जना का 

कुछ तो संबंध है

बरसने के साथ,

बिना बादल 

नहीं होती कोई गर्जना,

यह तो पूर्व लक्षण है

कि बादल बरसेंगे,

हम सभी

अब नहीं जल को

तरसेंगे।


ऐसे भी हैं आज

कुछ बादलनुमा सजीव

जो बनाए ही गए हैं

मात्र गर्जन के लिए,

आम आदमी के

तड़पाने के लिए,

जैसे हो कोई क्लीव,

मात्र प्रदर्शन और

गरजते हुए आश्वासन,

आम आदमी को भले 

न हो नित्य का राशन,

पर उन्हें तो देना ही है

कोरा भाषण,

भर सकते हो

इससे अपना उदर

तो भरो न!

अपनी प्यास 

कल्पना के अम्बु से 

पूरी करो न!

बातों के बतासे नहीं

रसगुल्ले खिलाते हैं,

कहते हैं पूरब 

और पश्चिम को जाते हैं।


सबका आच्छादन

इनका प्रधान गुण है,

आत्महित में निमग्न

इनका प्रत्येक

देह - कण है।

जल नहीं

जल की बात से ही

गरज पड़ते हैं,

चौकी चौपाल चौराहे

चतुर्दिक चभर चभर

 करते हैं।


एक नई संस्कृति का

निर्माण हो रहा है,

ऐसा नहीं कि 

आम आदमी 

सो रहा है,

अपने अस्तित्व रक्षा की

कुछ विवशताएँ हैं,

क्योंकि उनके ऊपर

छाई हुई काली

घटाएँ हैं, 

जिनसे  मात्र 

गरजने भर की 

 'शुभम'आशाएँ हैं।


🪴 शुभमस्तु!


२९.०७.२०२१◆७.४५ पत नम मार्तण्डस्य

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