सोमवार, 27 मार्च 2023

बौरा गए रसाल 🌳 [ दोहा गीतिका ]

 120/2023


■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

होली तो हो ली सखे,फूले किंशुक  लाल।

पाटल महके झूमकर,बौरा गए    रसाल।।


कोकिल कूके  बाग में, कुहू-कुहू   की  टेर,

चोली कसती जा रही, मन में उठे  सवाल।


बाली जौ गोधूम की, नाच रही नित   झूम,

पीपल दल के होंठ पर,उभरा लाल गुलाल।


फूल-फूल का रस चखे,तितली नीली पीत,

भँवरे गूँजें  मत्त हो, करते विकट  धमाल।


आए हैं  ऋतुराज  जी,पतझर के उपरांत,

कामदेव  धनु-बाण  ले,आया लेकर जाल।


विरहिन बाट निहारती,आए अभी न  कंत, 

नींद  न आए सेज में,काम रहा  है  साल।


महुआ   महके  बाग  में,गदराए   हैं  अंग,

बूढ़े  बरगद  ने  तजी, अपनी बूढ़ी  खाल।


ब्रज की झाड़ करील में,मधमासी की भीड़,

लगी  होड़ रस चूसने, गूँज - गूँज  दे  ताल।


चंचल  चितवन ने ठगा, यौवन को सुकुमार,

रूप न जाता आँख से, हृदय रहा  है  साल।


'शुभम्' प्रकृति के रूप का,कैसा कायाकल्प,

जड़-चेतन रसलीन हैं,नत हैं नयन विशाल।


🪴 शुभमस्तु !


16.03.2023◆6.00आ.मा.


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...