शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

त्योहार [ कुंडलिया ]

 362/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप  'शुभम्'


                        -1-

मानव    तन   त्योहार है,हे   मानव   ले    जान।

नरक योनि   कृमि कीट सब, काग ढोर पहचान।।

काग   ढोर   पहचान,सलिल   में रहते जलचर।

उड़ते   नभ   में   कीर,सर्प   चीलें  बहु नभचर।।

'शुभम्'    श्रेष्ठ  कर  कर्म,बने  मत हे नर दानव।

त्याग    नहीं   निज   धर्म, बने  ही रहना मानव।।


                          -2-

होली   दीवाली    सभी, सामाजिक त्योहार।

सभी   मनाते प्रेम से, संवत्सर घर   द्वार।।

हर   संवत्सर   घर   द्वार, खेलते  झाँझी टेसू।

रमणी  कर    शृंगार,  सजाएँ   श्यामल गेसू।।

'शुभम्'   सालियाँ और,भाभियाँ करें ठिठोली।

विजयादशमी    पर्व,   कभी   दीवाली होली।।


                              -3-

छाए    जीवन    में   सदा,  समरसता  हर  ओर।

आते   हैं त्योहार   नव,  बदल -बदल नव भोर।।

बदल-बदल   नव  भोर,   हृदय अनुरंजित करने।

मिटा   दुखों  का    शोर, प्रेम रस निश्छल भरने।।

'शुभम्'   नष्ट   कर ऊब,  हृदय  से हृदय जुड़ाए।

पल भर को भी  क्षीण,किरकिरापन क्यों  छाए।।


                              -4-

आते  हैं त्योहार  जब, जनगण   में  हो  हर्ष।

राग द्वेष   मिटते सभी,  रहे   न   शेष अमर्ष।।

रहे न  शेष  अमर्ष, सिखाते   हिलमिल रहना।

बढ़े एकता   मेल, आपदा   मिलकर सहना।।

'शुभम्'  पड़े ज्यों  तेल, मशीनों    में बतलाते।

जीवन की  हर  रेल, सहज   दौड़े जब आते।।


                         -5-

जिसके      जीवन    में   नहीं,  स्नेहन त्योहार।

नहीं  जानता  लेश    भी, जीवन   में उपकार।।

जीवन   में     उपकार, जी    रहा  जैसे कुत्ता।

भरता   अपना     पेट, द्वार    घर कुक्करमुत्ता।।

'शुभम्'  माँगकर  भीख,एक पल में जा खिसके।

स्नेहन   हैं    त्योहार, रहें   जीवन   में जिसके।।


शुभमस्तु,


22.10.2026◆6.30 प०मा०

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