363/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
फेंकते रहना है उन्हें
शांत सरोवर में पत्थर,
आया है जो जिस नियत से
करेगा भी वही,
इनके दिखावे के दाँत
देख चुकी है जनता।
साँप की प्रकृति ही है
उगलना हलाहल,
बिच्छू की प्रकृति
डंक मारना,
मानव की देह में
कीड़े-मकोड़े
कॉकरोच मच्छर,
पढ़े-लिखे निरक्षर।
पहचान गई है दुनिया
जान गया है देश,
इनकी मनसा क्या है?
कीचड़ में कीचड़ जा मिला
और पानी पानी अलग हो गया।
नाम नहीं
तो बदनाम ही सही,
गधों के लीडर
गधे ही तो होंगे,
तिलचट्टों के तिलचट्टे
घोड़े-हाथी नहीं।
सावधान हो जाओ 'शुभम्'
इन मुखौटाधारियों से
गधों ने शेर की खाल
ओढ़ रखी है,
जो शनैः शनैः खिसक रही है।
शुभमस्तु,
22.10.2026◆6.45 प०मा०
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