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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
चली मेंढकी नाल ठुकाने।
सत्ता की कुर्सी हथियाने।।
चावल लिया हाथ में अपने।
देख रही है मीठे सपने।।
कॉकरोच ले मक्खी मच्छर।
सत्तासन को देती टक्कर।।
अपनी खिचड़ी अलग पकाई।
डाल विदेशी चीनी खाई।।
चले पुलिस के मोटे डंडे।
भाग चले उलटे मुस्टंडे।।
खिसियानी बिल्ली मिमियाई।
हार गई तो मुँह की खाई।।
आग लगाकर भागे पीछे।
भाग रहे सब आँखें मीचे।।
नाल ठुकी भेकी टिटिआई।
बुद्धू बनी लौट घर आई।।
खेल समझती बच्चों वाला।
हज़म हुआ कब उसे निवाला।।
'शुभम्' बिलों में सभी समाए।
सत्तासन को जो ललचाए।।
शुभमस्तु,
19.10.2026◆ 2.15 प०मा०
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