361/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हालात के
हाथों बँधा
भवितव्य-मेला।
आदमी कहता
बड़ा बलवान हूँ
सामर्थ्यशाली
बुद्धि का
भंडार हूँ
मैं विश्व माली
कौन ऐसा
खेल है
जो मैं न खेला।
देखे
समय के पाँव किसने
किधर जाए
जाना कहाँ
किस ओर
पथ उलटा घुमाए
दास तू
हालात का
क्या- क्या न झेला !
कैसे अकेली जान
जीवन
जी रही है
जिंदगी की
फटी उधड़न
सी रही है
चूल्हा जलाए
आप ही
जीवन ढकेला।
दर नहीं
दीवार भी
छत भी नहीं है
आग जलती
पेट की
तन में कहीं है
मजबूरियाँ
एकांत शैशव
छोड़ें अकेला।
हालात घर के
चीखते
अब शेष क्या है
जिंदगी का
आज ये ही
फ़लसफा है
आस के ही
आसरे
भवितव्य वेला।
शुभमस्तु,
20.10.2026 ◆6.45 आ०मा०
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