रविवार, 14 अगस्त 2022

जिसकी पूँछ उठाई 🪺 [ गीत ]

 326/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🪹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिसकी पूँछ उठाई जाती,

निकल रहा  है मादा।


अवसर जिसको मिले 'सुनहरा',

क्यों करनी में छोड़े,

राम नाम की ओढ़ चुनरिया,

अपना मुख वह मोड़े,

दस -दस पीढ़ी खाएँ,

बैठी    मौज   मनाएँ,

बाहर  से   है   सादा।


बहुत जरूरी रँगना तन को,

राजनीति से रँग ले,

बन समाज का सेवी प्राणी,

राम श्याम का सँग ले,

झंडा  एक  लगा  ले,

मुखड़ा देह सजा ले,

या बन  गुंडा  दादा।


'कोई   नहीं  देखने वाला',

सोच  यही   है  तेरी,

पीकर के  अमृत तू आया,

किंतु नहीं  अब देरी,

होगी     जब    सुनवाई,

कुछ हो न सके हरजाई,

बतला  नेक   इरादा।


बोए  बीज  बबूल  हाथ से,

आम  कहाँ  से खाए,

कपड़े   रँगे  जलें अर्थी में,

ऊपर    नंगा    जाए,

बहुत  बड़ी  लाचारी,

हुई   जिंदगी  ख़्वारी,

बोझ गधे  का  लादा।


🪴 शुभमस्तु !


१४.०८.२०२२◆५.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

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