गुरुवार, 15 जनवरी 2026

साथ-साथ अच्छे लगते हैं [ गीत ]

 029/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भले पुराने हों

गाड़ी के दोनों पहिए

साथ -साथ अच्छे लगते हैं।


एक धुरी पर

दोनों चलते

एक साथ चूँ चरर मरर

बिना तेल

घिस-घिस कर रेंगें

अपनी मंजिल नाप डगर

किंचित मन में

द्रोह नहीं है

साथ-साथ अच्छे फबते हैं।


अपनी कहें

सुनें सब उनकी

इसको  कहते प्रेम सभी

वाद विवाद 

न करते पल को

उर न विलग हो रंच कभी

करते याद

अतीत काल की

एक दूसरे को नवते हैं।


कब तक साथ

निभेगा सँग - सँग

कोई नहीं जानता इसको

हँस मुस्काकर

रहें साथ में

वृथा न करते जीवन रस को

खो जाते

अतीत में अपने

सोते कम अति जगते हैं।


शुभमस्तु !


13.01.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...