031/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
थामे हैं प्रभु डोर, जीवन एक पतंग है।
निशि-दिन संध्या-भोर,नभ में ऊँची उड़ रही।।
तन-मन वृहदाकाश, उड़ते प्राण पतंग-से।
तब तक पूरी आश,जब तक डोरी हाथ में।
आया है ले सीख, पर्व मकर संक्रांति का।
नहीं किसी पर चीख,अपनी उड़ा पतंग को।।
खुला हुआ आकाश, मानव एक पतंग है।
पर धरती पर नाश,जितना भी ऊँचा उड़े।।
कहता जगत पतंग, उड़ती है आकाश में।
बनना नहीं मलंग,सीमा में अपनी उड़ें।।
समय -पवन के साथ,उड़ता मनुज पतंग -सा।
हैं प्रभु जी ही नाथ,वश अपना चलता नहीं।।
परवश सदा पतंग, पति -पत्नी पतवार सम।
बन मत मनुज मलंग,अंकुश भी अनिवार्य है।।
उड़ें जदपि आकाश,परिजन सभी पतंग -से।
करना नहीं विनाश,डोर न काटें अन्य की।।
शिक्षा सबक प्रतीक, गगनांचल में उड़ रही।
चलना नहीं अलीक,जानें 'शुभम्' पतंग को।।
चलें समय के संग, रुख पहचानें वायु का।
पथ है वायु -तरंग, जैसे एक पतंग का।।
नभ में कभी पतंग,बिना डोर उड़ते नहीं।
बिखराते नवरंग,ओझल हो मत दृष्टि से।।
शुभमस्तु !
15.01.2026◆ 10.45 आ०मा०
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