सोमवार, 12 जनवरी 2026

करो नहीं विद्रोह [ दोहा ]

 20/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संतति  जननी-जनक   से,करते जो विद्रोह।

उनके प्रति रहता  नहीं,  नेह न उर में  मोह।।

करता गुरुजन के लिए, शिष्य  अगर विद्रोह।

कृपापात्र बनता  नहीं,मिले  उसे नित कोह।।


रहते हो जिस  देश में, खाते  जिसका अन्न।

करो नहीं   विद्रोह   तुम,  तब  होगे सम्पन्न।।

मित्रों से जिस  ने किया, अगर कभी विद्रोह।

मर   जाए वह  मित्रता,  धूल  मिले व्यामोह।।


जिनके  प्रति  विश्वास  हो, नहीं  करें विद्रोह।

होता है  किंचित  अगर, नष्ट  करे  उर छोह।।

भरा  हुआ    विद्रोह  से, वहाँ  न  रहता नेह।

उर में जलती आग  हो,शेष  कहाँ  फिर मेह।।


भाव  बुरा    विद्रोह  का,  करे  घाव  सर्वत्र।

आग  लगाए   देश  में, मिटा  प्रेम के सत्र।। 

घाती  का  विद्रोह  से, निकट  सदा सम्बंध।

सद्भावी  होता नहीं,   तोड़  सभी अनुबंध।।


मन में  यदि विद्रोह  का, रहता  लेश निवास।

रिश्ते   जाते   भाड़  में,मिटा  सकल विश्वास।।

देशद्रोह    में  लिप्त    हैं, करते   नित विद्रोह।

पले     सपोले  देश   में,  देते     ही अवरोह।।


करते   हैं  विद्रोह   जो, करें   देश   का नाश।

आस्तीन के  साँप   से,  करें न किंचित आश।।

शुभमस्तु !


08.01.2026◆11.45 आ०मा०

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