गुरुवार, 1 जनवरी 2026

सूरज वही चंदा वही [ नवगीत ]

 003/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सूरज वही

चंदा वही

बस हवा में है नयापन।


बह रही

नदिया किलकती

आज भी वैसी हठीली

कोहरे की 

धूम शीतल

बदली हुई लगती पनीली

हेमंत में

फिर आ गया है

तुहिन सा जमता नयापन।


बढ़ गई है

उम्र फिर से

वर्ष के बारह महीने

कोट स्वेटर 

ने छुड़ाए

देह में लवणी पसीने

दुल्हिनों को

भा गया है

ससुर के घर का नयापन।


तापते हैं

आग पर

वे वृद्ध-वृद्धा कह कहानी

उन दिनों की

वे युवा थे

दौड़ भरती थी जवानी

भाता नहीं

अब नए युग की

नवल पीढ़ी का नयापन।


शुभमस्तु !


01.01.2026◆ 9.45 आ०मा०

                      ◆●◆

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