शनिवार, 3 जनवरी 2026

सरस्वती स्तवन

 004/2026


               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वीणापाणि   शारदा   प्रज्ञा  वीणा शुचि गुंजारती।

वागीश्वरी विमल रसना को निज रस से संवारती।।


ज्ञानदायिनी कमला माते तव कृतज्ञता को धरता।

पद्माक्षी माँ हंसवाहिनी भावकुंज विचरण करता।।


कादम्बरी  पावका  काली  विमला इरा चंद्रिका तुम।

मातु ज्ञानदा ज्ञान भरो उर छिड़क दिया मानो कुमकुम।


कविजिह्वाग्रवासिनी  तुमसे उऋण नहीं कवि होता है।

विमला   वरप्रदा   माँ  ब्राह्मी नहीं सूखता सोता है।।


मातु भारती रमा तुम्हारा ध्यान  लगाए बैठा हूँ।

लगता है माँ  महादेविका  ज्ञान सिंधु में पैठा हूँ।।


वसुधा   शिवा   सुभद्रा  श्रीप्रदा कल्याण करो।

सुरवंदिता परा माँ शुभदा उरगत तम को शीघ्र हरो।


विश्वा   भामा   मातु गोमती   हंसासना नमन  मेरा।

युगल   चरण  में मुझे बसाओ भूलूँ नहीं नाम  तेरा।।


जन्म-जन्म मैं करूँ साधना माता के शुभ चरणों की।

यही चाहना एक  मात्र   है श्रीप्रदा की शरणों की।।


शुभमस्तु !


01.01.2025◆ 8.30 प०मा०

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