038/2026
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
'तो मेरे प्यारे श्रोताओ! जरा इतना तो बताओ कि आपको कौन सी रचना मैं सुनाऊँ और हँसते -हँसाते लोटम पोट कराऊँ ! श्रोताओं में से पीछे से एक आवाज आई : 'वही सुनाओ लहँगे वाली' तभी एक अन्य आवाज उभरी : 'नहीं ,पाजामे वाली सुनाओ।' अब श्रोताओं में लहंगे और पाजामे में जंग छिड़ गई और पाजामा हार गया और लहँगे की जीत हो गई।अब हँसोड़ कवि महाराज लहँगा सुना रहे हैं। पहले थोड़ा गुनगुना रहे हैं और अब तरन्नुम में आ रहे हैं। सभी श्रोता तालियाँ बजा रहे हैं।
ये हैं आजकल के 'अखिल भारतीय मंचीय कवि सम्मेलन' बनाम 'अखिल भारतीय लतीफा झेलन'। जैसे श्रोता वैसे ही कवि, तदनुसार बनी है उनकी छवि।जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे लहँगा का कवि। कवि अपने में शून्य है ,जीरो है;श्रोता जनता ही वास्तविक हीरो है। कवि का ओंन ऑफ का स्विच जनता के हाथों में है, वह जैसा चलाए, वैसे ही उसे चलना है, एक इंच भी इधर से उधर नहीं फिसलना है।कवि तो एक प्री एडिटेड टेप रिकॉर्डर है,बस उसे ऑन भर करना है और मन मर्जी का लतीफा सुनना है।यही तो उसकी कविता है।बीच बीच में कुछ रटे रटाये जुमलों से गुजरना है। 'इस शहर के श्रोता बहुत अच्छे हैं। ' 'आप बहुत अच्छा सुन रहे हैं।' 'आप बड़े ही अनुशासित हैं।' 'सभ्यता और संस्कृति के वाहक हैं।' 'मेरे जैसे अच्छे कवियों के गाहक हैं।'
किसी मंचीय कवि का स्विच कवि के पास नहीं है। वह श्रोताओं के पास है। वह जो कहेगा ,वही कविता मंच पर लहलहायेगी।कवि में तो कुछ खास- खास भरा हुआ है' ,जो मंचआगमन के साथ हरा हुआ है। यह तो मंच आयोजक की 'हुआ' 'हुआ' है कि आज वह यहाँ सबकी बड़ी बुआ है। बस दो चार कवितानुमा चुटकुले उसकी जुबाँ पर जमे हैं,उन्हीं की डिमांड है, उसी से लिफाफे कमे हैं।तालियों के बिना उनकी जीभ लड़खड़ाती है ,इसलिए बीच बीच में तालियों की याद दिलाना भूल नहीं पाते हैं। तालियों से ही तो उनकी रगों में कविता दौड़ पाती है ,जो श्रोताओं की श्रवणेच्छा जगाती है।
मंचीय कवि को कविता लिखना और पढ़ना बहुत ज़्यादा नहीं सीखना। यह तो एक हुनर है,कला है, विशेष शैली है ;फिर तो सम्मेलनों में थैली ही थैली है। मंचीय कवि कोई लिक्खाड़ कवि नहीं है, वह जो कह दे ,वही कविता की कड़ी है। इससे वह जिसकों भी पीट दे, ऐसी वह कलात्मक छड़ी है।अब वहाँ पुलिस हो ,मंत्री या बड़ा नेता; वह सबकी खाट खड़ी कर देता।वहाँ न कोई एक्ट है न कोई धारा है,पुलिस हो या नेता, बेचारा है।जो वह सुनाए ,सब सुनना ही सुनना है। कानून के धरातल पर कुछ नहीं बुनना है।इधर से सुना उधर निकल जाना है, कवि को गरियाने में कदापि नहीं लजाना है।
यही तो इन कवियों का अपना जमाना है। उसकी नब्ज जनता के हाथ है। जनता ही भगवान ,उसको नमन माथ है। वैसे इन कवियों की इतनी ही औकात है।सब कुछ खुली किताब है।जितना चाहें रायता फैलाएं, खाएँ न खाएँ या जितना गिराएँ।यहीं पर अटकी हैं,इनकी सफलताएँ। अपने लतीफों में सबको उलझाएं। भला इनसे बड़ा वीआई पी कौन है, यदि कोई सोफे पर विराजमान है ,तो वह भी पड़ा मौन है।अपनी सचाई सुन-सुन के कोई बेहोश तो कोई बेचैन है !
यहाँ नए के नाम पर सब कुछ पुराना है। अपना ही लतीफा बार- बार सुना आना है।यही 'वर्तमान मंचीय हास्य कपि सम्मेलन' है,जनता की माँग है तो जनता को ही झेलन है। लिफाफे भरे जा रहे हैं। कवियों की औकात को मापे जा रहे हैं। अपना न हो तो स्वचोरित भी चलता है। चोर-चोर मौसेरे भाई हों तो कहो कौन किसे छलता है। जिसने स्विच ऑन किया वही हाथ मलता है।तालियाँ बजाता हुआ हॉल से बाहर निकलता है : 'अरे यह तो वही सुनाया जो पिछले साल होली पर सुना था। क्या इनके पास नया कुछ भी नहीं है?'
शुभमस्तु !
19.01.2026◆4.30 प०मा०
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