045/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्
उनकी जुबान में
कोई और ही
मशीन लगी है,
चलते -चलते
थकती ही नहीं है,
कभी भी
दो महिलाएँ
चुप नहीं बैठ सकतीं,
यह प्राकृतिक चमत्कार है
बिना रेगुलेटर के
पंखे की तरह स्वतंत्र।
कितना स्वार्थी है
ये 'पुरुष' नामक जीव
बिना मतलब के
नहीं बोलता,
चार आदमी
अपरिचित बैठे हों
उनकी जीभ का
कोना भी नहीं हिलता,
पता नहीं
इस अनायास
मौन धारण में
उन्हें क्या मिलता,
सही कहा है:
सदैव सदा
'सद्गुण' का फूल
सर्वत्र नहीं खिलता,
बिना ऑन ऑफ का
टीवी सबको नहीं मिलता।
और कुछ नहीं तो
चुगलियाँ ही सही,
सास ने दूसरी सास से
बहू ने मोहल्ले की
दूसरी बहू से कही,
सबसे रसदार है
ये चुगली-चर्चा
दो कौड़ी का भी
इसमें लगता नहीं खर्चा,
रस ही रस है यहाँ
किसी को
लगती नहीं मिर्चा।
कुदरत ने
दो विरोधाभासों को
मिलाया है,
पहले तो थे वे दोनों दोपाये
अब चौपाया बनाया है।
इतिहास गवाह है कि
आज तक किसी को
अच्छी बहू नहीं मिली,
और किसी भी बहू को
सास भली नहीं मिली,
और ये पुरुष भी
अजीब है कि
कभी सास बहुओं की
चर्चा तक नहीं करता,
बुराई तो क्या
खाकर करेगा !
करेगा भी तो
अपने किए का भरेगा।
इधर उत्तरी ध्रुव है
तो उधर दक्षिणी ध्रुव,
दोनों मिलते हैं
पर अपने ही ढंग से,
बाद में
उत्तर उत्तर
और दक्षिण दक्षिण
एक उत्तर तो
एक सदा ही प्रश्न,
प्रतिप्रश्न,
पर कीजिए भी क्या
किए हुए हैं
परस्पर संलग्न।
शुभमस्तु !
22.01.2026◆2.15प०मा०
◆◆◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें