041/2026
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डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आज मुझे ज्ञात हुआ कि मैं तो दस-दस गुरुओं के पास हूँ। फिर भी ज्ञान का पिपासु हूँ। अंततः मैं क्यों उदास हूँ।देर आयद दुरुस्त आयद; यदि सुबह के भूले को साँझ तक भी अपना घर मिल जाए ,तो वह भूला नहीं कहलाता। वैसी ही दशा कुछ मेरी भी हो रही है।मैं नित्य प्रति देखता हूँ कि मेरे दोनों हाथों में दस अंगुलियाँ हैं। ये अंगुलियाँ ही नहीं ,मेरी शिक्षक हैं, मेरी गुरु हैं । मैं उनका शिष्य हूँ,उनका भक्त हूँ ,उनमें अनुरक्त हूँ। इनके कार्यों और प्रेरणाओं की गहराई में जाता हूँ तो बहुत कुछ सीख पाता हूँ।इनकी सीख से मुझे बहुत बड़ा बल मिला है।परिवार और समाज में कैसे रहना चाहिए ,यह इन्हीं का दिया है।
हाथ की पाँचों अँगुलियों में सबका कद काठी अलग-अलग है। सबके अपने-अपने नाम हैं। नामों के अनुकूल उनके बंटे हुए काम हैं।किसी का किसी के प्रति कोई विरोधाभास नहीं है। जो वे करती हैं ,वह सदा सही है।इतिहास बताता है कि अंगुलियाँ आपस में कभी लड़ी नहीं हैं।सदा एकता और समता के मंत्र का पाठ पढ़ाया है। उसी एकता के सूत्र में ये गात नहाया है। कहीं कोई छूत नहीं,कोई भेदभाव नहीं। कोई काम इनके लिए छोटा नहीं,बड़ा नहीं। हर समय हर काम करने के लिए सहर्ष तैयार।न कोई आलस्य न खुमार। संगठन हो तो इन अँगुलियों जैसा, जिन्हें नहीं चाहिए काम के बदले पैसा।
इन्हीं की कृपा और श्रम से उदर को भोजन मिलता है,इन्हीं के संघर्ष से अशुचिता में फूल खिलता है। नित्य शौचालय में अशौच को शुद्ध बनाती हैं। फिर पानी आदि से स्वच्छ होकर उन्हीं हाथों से रुचिपूर्वक भोजन कराती हैं। दोनों परस्पर विरोधी कार्य बिना किसी झिझक के निबटाती हैं। एक कर्तव्य समझकर, एक धर्म समझकर, श्रम का मर्म समझकर। मानव के ऊपर इनका कितना बड़ा अहसान है।अँगुलियों के कर्म का तना कितना बड़ा वितान है।इनके ही हाथ में लेखनी है तो इनके वश में कृपाण हैं।इन्हीं के दोनों हाथ में लड्डू हैं तो इन्हीं में पिसान हैं ।यही कवि हैं,लेखक हैं,जवान हैं,किसान हैं। वास्तव में ये दस अंगुलियाँ कितनी महान हैं।
शीत ऋतु में जमे हुए घी को निकालना हो तो सबसे पहले तर्जनी अँगुली सामने आती है। वही टेड़ी पड़ती है,तभी घी निकाल पाती हैं।यहाँ ऐसा नहीं है कि तू जा!,तू जा!! की रार ठनेगी ! तर्जनी को बरज छिगुली की आ बनेगी।या कोई बड़ी से कहेगा कि तू जा ! तू तो बड़ी है। घी निकालने के लिए जैसे तू एक छड़ी है।किंतु नहीं, इस काम के लिए तर्जनी की अहम जरूरत आ पड़ी है ,तो अपना कार्य करने के लिए वही सहर्ष आगे आकर खड़ी है। माथे पर तिलक अँगूठा ही लगाता है,बड़ी से बड़ी अँगुली से यह कार्य नहीं करवाया जाता। भूले-भटके राही को रास्ता अँगूठा या अनामिका नहीं बताती,वहाँ भी सबसे पहले तर्जनी ही सामने आती। पड़ती है जब मुक्के की जरूरत तब सभी पाँचों एक हो जाती हैं और पंजे से घूँसा बन जाती हैं। इसे कहते हैं :संगठन,एकता ,समता और बड़प्पन। पाँच जब मिलती हैं तो हो जाती हैं छप्पन।अलग-अलगउद्भव अलग -अलग अंत, काम करती हैं ऐसे जैसे कोई संत।इनकी महिमा जितनी कही है,है ही वह अनंत।इसीलिए तो बारहों मास रहता है अँगुलियों में वसंत।
दोनों हाथों की ये अंगुलियाँ मेरी ही नहीं ,हर व्यक्ति और मानव मात्र की शिक्षक हैं,गुरु हैं,प्रेरणा हैं,दिग्दर्शक हैं, पथ प्रदर्शक हैं। बात इतनी सी है कि कोई इनके महत्त्व को समझे।इनसे प्रेरणा ग्रहण करे।इन्हीं में राष्ट्रीय एकता का मूल मंत्र छिपा हुआ है। छूत- पाक से इतर इनमें कहीं कोई दुर्भाव नहीं, सद्भाव ही सद्भाव है। मानव जीवन के लिए ये एक मिशाल हैं। यदि इनके पास भी कोई हृदय हो,तो वे हृदय से विशाल हैं।ये निर्विकार हैं,मानव देह का उपहार हैं।
शुभमस्तु !
21.01.2026◆1.30प०मा०
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