गुरुवार, 15 जनवरी 2026

जीवन एक पतंग है [ दोहा ]

 030/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जीवन    एक      पतंग  है, थामे   हैं  प्रभु डोर।

नभ  में  ऊँची उड़  रही,निशि-दिन संध्या-भोर।।

उड़ते   प्राण    पतंग-से,  तन-मन वृहदाकाश।

जब   तक डोरी हाथ  में,तब  तक  पूरी आश।।


पर्व   मकर   संक्रांति  का, आया है ले  सीख।

अपनी   उड़ा पतंग  को, नहीं किसी पर चीख।।

मानव   एक   पतंग   है,खुला   हुआ आकाश।

जितना  भी  ऊँचा  उड़े,पर  धरती  पर नाश।।


उड़ती    है   आकाश   में, कहता जगत  पतंग।

सीमा  में   अपनी   उड़ें,   बनना   नहीं  मलंग।।

उड़ता  मनुज   पतंग-सा, समय -पवन के साथ।

वश  अपना चलता नहीं,हैं प्रभुजी    ही नाथ।।


पति-पत्नी पतवार सम,  परवश   सदा पतंग।

अंकुश भी अनिवार्य है, बन मत मनुज मलंग।।

परिजन सभी पतंग-से, उड़ें जदपि आकाश।

डोर न  काटें  अन्य   की,करना नहीं विनाश।।


गगनांचल  में उड़  रही,शिक्षा सबक प्रतीक।

जानें 'शुभम्' पतंग को, चलना  नहीं अलीक।।

रुख  पहचानें  वायु   का, चलें  समय के संग।

जैसे  एक   पतंग    का, पथ  है   वायु तरंग।।


बिना  डोर   उड़ती    नहीं, नभ में कभी पतंग।

ओझल   हो   मत   दृष्टि से,  बिखराते नवरंग।।


शुभमस्तु !


15.01.2026◆ 10.45 आ०मा०

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