सोमवार, 12 जनवरी 2026

शिशिर शीत साम्रज्य [ दोहा ]

 019/2026


       

[ माघ,कुहरा,शिशिर,बर्फ,धरती ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक


चरम शिखर   पर  शीत  के,आया है शुभ माघ।

यत्र   तत्र  सर्वत्र    ही,   किंचित    नहीं निदाघ।।

स्नान-दान  तप के  लिए,   डूब     नहीं अस्ताघ।

भानु- विष्णु  को पूजिए,ख्यातिलब्ध शुचि माघ।।


कुहरा     ओढ़े   शीत    का,चारों ओर धमाल।

त्याग झील   कैलाश   की,  उतरे   धरा मराल।।

हाथ न  दिखता हाथ को,कुहरा अति घनघोर।

खगदल   दुबके   नीड़ में,  छिपे  वनों में मोर।।


पौष-माघ   के शिशिर से, काँप रहे  जन-जीव।

विरहिन   तकती   राह  को, कब आएँगे पीव।।

कट-कट   की  ध्वनि  में बजें,नर-नारी के दाँत।

शिशिर रंग  दिखला रही,काँप रही बक -पाँत।।


नद-नाले    जमने   लगे, बर्फ  दुग्ध सम  सेत।

सड़कों   पर   देखो जमी,तुहिन सघन समवेत।।

पतित बर्फ   आकाश  से, दृश्य मनोरम देख।

महिमा     बड़ी   विचित्र  है,  ईश्वरीय संलेख।।


सजल     शीत    संतप्त   हैं ,धरती नीलाकाश।

जीव जगत  कंपित  हुआ, धूमिल भानु प्रकाश।।

धरती   पर  पसरा   हुआ, सन्नाटा   चहुँ  ओर।

उषा जगी   आकाश    में,  लगे   न  होता भोर।।


                  एक में सब

माघ मास कुहरा घना, शिशिर शीत साम्राज्य।

धरती जल नभ बर्फ से,एक रूप अविभाज्य।।


शुभमस्तु !


07.01.2026◆3.00आ०मा०

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