रविवार, 4 जनवरी 2026

फिक्साइल [ व्यंग्य ]

 010/ 2026


                 

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

मोबाइल के आविष्कारक मार्टिन कूपर जी ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि जिस फोन को उन्होंने मोबाइल के नाम से आविष्कृत किया है,कुछ गुणी लोग उनसे भी आगे बढ़कर उसे 'फिक्साइल' बना देंगे।यह अलग बात है कि ऐसे गुणवानों की संख्या बहुत अधिक नहीं तो कुछ हजार में तो होगी ही। बैटरी की तरह सेट उनके शरीर में फिक्स हो गया है। उनके अन्य काम भी बखूबी चलते रहते हैं और बिना किसी व्यवधान के उनकी वार्ता का क्रम भी अनवरत चलता रहता है। वे मोबाइल हो सकते हैं,किन्तु उनका सैट उनकी आंख कान की तरह उनके शरीर का अंग बन गया है।

यदि 'मोबाइल' किसी बीमारी (ILL)नेस का नाम है , तो 'फिक्साइल' भी एक असाध्य बीमारी है। इसमें वह मशीन जो औरों के लिए गतिशील है,उनके लिए उनके कर्ण कुहरों में कोहराम मचाने वाला तूफान है। शायद नहाते धोते समय वे कान के ढक्कनों को देह से विलग भले करते हों,किंतु अन्य अवसरों पर वे स्वचालित रहते होंगे। ऐसा लगता है कि वे संसार के व्यस्ततम व्यक्ति हैं। उन्हें इस महत कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाना चाहिए। ऐसे लोगों की गिनती कराने बैठूँ तो दो चार तो मेरी अँगुलियों के पोरुओं पर ही गिन लिए जा सकेंगे। मुझे यह पता नहीं कि आप उनमें सम्मिलित हैं अथवा नहीं। यदि आप उनमें से एक हों,तो कृपया अवगत कराना।आपका नाम भी उस सूची में सम्मिलित कर लिया जाएगा ,जिन्हें सुपर  'फिक्साइल' मैन के रूप में अवार्ड दिया जाने वाला होगा।

जो लोग एक आम आदमी न रहकर 'फिक्साइल' मेन का पद प्राप्त कर चुके हैं ,उन्हें अपने इस पद पर बने रहने के लिए बहुत सावधानियों की आवश्यकता है। उनके सिर पर खतरे ऐसे मंडरा रहे हैं ,जैसे किसी शादी में दावत खाते समय उड़न (ड्रोन) कैमरा सिर पर मँडराता है और निगरानी रखता है कि कौन क्या- क्या और कितना- कितना खा रहा है। जब आपका ध्यान सेट की वार्ता में व्यस्त रहता है,तब आप अपनी जान की भी परवाह नहीं करते। मुझे मालूम है कि आप बाइक या चार पहिया वाहन चलाते समय भी इसे प्रथम वरीयता देते हैं और वाहन कहाँ जा रहा है या किससे भिड़ रहा है ;  इसकी कोई फिक्र नहीं करते।

ऐसा लगता है कि इस जीवन के ये 'फिक्साइल' पर्सन जब अगला जन्म लेंगे और उनके सौभाग्य से मानव योनि ही मिल गई तो हो न हो ये फिक्स सेट बंदर की पूँछ की तरह उनकी देह से या कान से फिक्स ही न मिले और सेट गर्भनाल से जुड़ा हुआ ट्रिंग ट्रिंग करता हुआ पाया जाय।इधर आप हुआ- हुआ हुआ- हुआ कर रहे होंगे ,उधर वह ट्रिंग -ट्रिंग का राग अलाप रहा होगा। तब आप कहेंगे अबे चुप हो जा ! पहले मुझे अच्छी तरह बाहर तो निकल जाने दे। तेरी ट्रिंग -ट्रिंग सुनने के लिए तो जिंदगी पड़ी है। जरा नर्स को साफ सुथरा करने दे,मैं नंगा हूँ ,कुछ चड्डी लंगोट तिकोनिया वगैरह तो पहन लेने दे। ।मुझे शरम आ रही है और तू लगा है ट्रिंग -ट्रिंग करने।

मोबाइल को 'फिक्साइल' बनाने का काम हर एक व्यक्ति का नहीं है। जो संसार के सबसे जबरदस्त व्यस्ततम हैं,वही इसको बना सकते हैं। सड़कों पर आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं में ऐसे ही लोग शामिल होते हैं। जिन्हें अपने जीवन और घर परिवार से अधिक 'फिक्साइल' वार्ता ही प्रिय होती है। जीवन का क्या है,वह तो आना जाना है। ये 'फिक्साइल' तो स्वर्ग में भी दुर्लभ है। इसलिए इसे स्वतन का अनिवार्य अंग बना लिया जाए। इस व्यंग्यकार ने तो सोचा है कि क्यों न एक 'फिक्साइल क्लिनिक' खोल लिया जाए और इसके प्रेमियों के विशेषअंगों में इसे फिक्स करने के काम का श्रीगणेश कर दिया जाए।

शुभमस्तु !

03.01.2026◆ 9.00 प०मा०

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