016/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दूर न फेंको अपनी लट तुम।
हे मृगनयनी! सँवरो झट तुम।।
करो न जलदी जल भरने की,
कटि तट रखो सँभलकर घट तुम।
पदचल भंग हुई मत घबरा,
करने दो उसको फटफट तुम।
ध्यान धरो मन में निज प्रिय का,
राधे-राधे पथ में रट तुम।
यद्यपि थक कर चूर हुई हो,
रुको राह में सघनित वट तुम।
कदम बढ़ाओ अपने धीमे,
करो नहीं यों पद खट -खट तुम।
'शुभम्' सुझाव दे रहा उत्तम,
उसे मान लो अब झटपट तुम।
शुभमस्तु !
05.01.2026◆2.45आ०मा०
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