सोमवार, 12 जनवरी 2026

अंग्रेज़ियत जाती नहीं [ नवगीत ]

 022/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जा चुके 

अंग्रेज पर

अंग्रेज़ियत जाती नहीं।


मातृभाषा 

बोलने में

शर्म आती है उन्हें

आंग्ल में

कुछ गिटपिटाने का

गुमाँ उबला जिन्हें

बन नहीं

पाए वे घोड़े

गदहेहियत आती नहीं।


डैड हैं

उनके पिताजी

और माँ मम्मी बनी

किंतु लेकिन

कौन जाने

बट बट करें मूँछें तनी

खा रहे 

खिचड़ी विदेशी

गँवई हवा भाती नहीं।


गिनतियाँ

सौ तक न आएं

फोर्टी चालीस में

कौन है

किससे बड़ा ये

टेन ट्वेंटी बीस में

अंग्रेज वे 

काले स्वदेशी

देशियत थाती नहीं।


शुभमस्तु !


08.01.2026◆3.15 प०मा०

                ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...