011/2026
[दोस्त,मित्र,साथी,यार,सखा ]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
दोस्त वही जो दोस्त का,विपदा में गह हाथ।
बने सहायक रात-दिन, सदा निभाए साथ।।
दोस्त दोस्त के साथ में,कर धोखे की आड़।
गला घोंटते आजकल, लगा सुरा की चाड़।।
मित्र कहाँ अब कृष्ण-से, भेदभाव से मुक्त।
मिले सुदामा एक ही, आजीवन अनुरक्त।।
मित्र मित्र के भेद को, पहचाने दिन-रात।
किंतु कभी खोले नहीं,जदपि समय की घात।।
साथी है सच्चा वही, सदा निभाए साथ।
नहीं कभी धोखा करे,विनत रहे नित माथ।।
कलयुग में साथी कहाँ,साँची रही न प्रीत।
सभी स्वार्थ में लिप्त हैं, निकल गई है तीत।।
यार सभी सच्चे नहीं,कुछ ही हैं निस्वार्थ।
जब तक पैसा गाँठ में,तब तक उनका अर्थ।।
दुश्चरिता नारी बुरी , धोखा करे प्रगाढ़।
यार बने सब काम के,लपक गई है दाढ़।।
सखा बिना दुर्भाव के,खाना खाते साथ।
जाति-पाँति से दूर हैं, सदा विनत है माथ।।
सखा-सुदामा कृष्ण-से , मिलें न ढूंढ़े एक।
दिवस-निशा जो साथ दें, तजते नहीं विवेक।।
एक में सब
दोस्त मित्र साथी सखा,मिलें न साँचे यार।
कलयुग की यह बात है, स्वार्थ लिप्त संसार।।
शुभमस्तु !
04.01.2026◆ 3.00आ०मा०
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