रविवार, 4 जनवरी 2026

मित्र कहाँ अब कृष्ण-से [ दोहा ]

 011/2026  


          

        [दोस्त,मित्र,साथी,यार,सखा ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

    

                  सब में एक

दोस्त वही जो  दोस्त  का,विपदा में गह हाथ।

बने  सहायक  रात-दिन, सदा   निभाए साथ।।

दोस्त  दोस्त के  साथ में,कर धोखे की आड़।

गला  घोंटते आजकल,  लगा सुरा   की चाड़।।



मित्र कहाँ   अब  कृष्ण-से, भेदभाव से मुक्त।

मिले  सुदामा  एक   ही,   आजीवन अनुरक्त।।

मित्र मित्र   के   भेद     को, पहचाने दिन-रात।

किंतु कभी खोले नहीं,जदपि  समय की घात।।



साथी है    सच्चा  वही,   सदा  निभाए साथ।

नहीं कभी धोखा  करे,विनत  रहे  नित माथ।।

कलयुग   में साथी  कहाँ,साँची रही न प्रीत।

सभी   स्वार्थ   में लिप्त हैं,  निकल गई है तीत।।


यार सभी    सच्चे   नहीं,कुछ ही हैं निस्वार्थ।

जब तक पैसा गाँठ में,तब तक उनका अर्थ।।

दुश्चरिता  नारी    बुरी ,    धोखा   करे प्रगाढ़।

यार  बने   सब  काम के,लपक गई है दाढ़।।


सखा  बिना    दुर्भाव    के,खाना खाते साथ। 

जाति-पाँति   से दूर   हैं,  सदा विनत है माथ।।

सखा-सुदामा   कृष्ण-से ,  मिलें न ढूंढ़े एक।

दिवस-निशा जो साथ दें, तजते नहीं विवेक।।


                   एक में सब

दोस्त मित्र  साथी  सखा,मिलें न साँचे   यार।

कलयुग की यह   बात  है, स्वार्थ लिप्त संसार।।


शुभमस्तु !


04.01.2026◆ 3.00आ०मा०

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