सोमवार, 19 जनवरी 2026

अनुभव [ कुंडलिया ]

 034/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता है जो  कर्म  को,वह  अनुभव का कोष।

पाता  है   समृद्धि   भी,  सदा   हृदय  में तोष।।

सदा हृदय में   तोष,  अन्य  को ज्ञान सिखाए।

पथ से    जाते  चूक,  उन्हें  सतपथ दिखलाए।।

'शुभम्'  वही  गुणवान,  मुकुट  माथे पर धरता।

चमके   सूर्य   समान, वही कुछ अद्भुत करता।।


                         -2-

अनुभव  होता    है  जिसे,  देता   है नित  काम।

जिनको   है    अनुभव  नहीं, करते   हैं आराम।।

करते    हैं    आराम,  समय   पर  धोखा खाएँ।

कर लेते  यदि   काम,  सोच   मन   में पछताएं।।

'शुभम्'  कर्म  का  कोष,समय पर बनता अजगव।

कर्मशील    संतोष   ,  सदा     देता     है अनुभव।।


                         -3-

कोरा  ज्ञान न  काम  का,जो   अनुभव  से हीन।

मुख   चमके   उनका   नहीं, रहता  सदा मलीन।।

रहता   सदा   मलीन,  कर्म   की  महिमा भारी।

आजीवन    दे    काम,  करे   नर    जो तैयारी।।

'शुभम्'   वृथा   आराम,   पड़ा  ज्यों कोई  बोरा।

तन मन   हो  बेकाम, बिना   अनुभव  के कोरा।।


                         -4-

चलते    हैं     जो   राह   में,  पाते   हैं गंतव्य।

लक्ष्यसिद्धि  उनको  मिले, करें  पूर्ण कर्तव्य।।

करें  पूर्ण   कर्तव्य, शीश   पर   मुकुट विराजे।

अनुभव  पाते  दिव्य, उन्हीं   के   बजते बाजे।।

'शुभम्' नहीं जो लोग,कभी मानव को छलते।

वही चमकते भानु,सदृश निज पथ पर चलते।।


                          -5-

करता    है  कर्तव्य  जो, अनुभव मिलें अनेक।

करते-करते   काम   को,   जाग्रत रहे विवेक।।

जाग्रत   रहे   विवेक, ज्ञान   का  कोष बढ़ाए।

अवसर पा  अनुभूत, व्यक्ति   उलझी सुलझाए।।

'शुभम्'  बिना  ही काम, ढोर-सा रहा  विचरता।

अनुभव  से  रह  शून्य,काम  पशुओं के करता।।

16.01.2026◆7.00आ०मा०

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