शनिवार, 3 जनवरी 2026

नया नई नए [ आलेख]

 006/2026 

 

 ©लेखक

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 'नया' या 'नई' अथवा 'नए' शब्द में ही एक विचित्र आकर्षण है। अब वह नई कोई वस्तु हो,वर्ष हो, व्यक्ति हो,स्त्री हो ,भाव हो,विचार हो अथवा दुनिया का कोई भी स्थान हो ; वह नया है तो वह हमारी जिज्ञासा,हमारे चिंतन ,हमारी सोच और हमारी वैचारिकता में एक परिवर्तन लाने वाला है। अब नए वर्ष को ही ले लीजिए अब कल ही वह नया हुआ है,उस नए के आगमन की प्रतीक्षा सारा संसार कर रहा था। जैसे सब कुछ बदल जायेगा।कितना कुछ बदला है ,यह तो हम और आप सब देख और अनुभव कर ही रहे हैं। वैसे मेरे विचार से नयापन में नया कुछ भी नहीं है ,यह मात्र हमारी आपकी सोच का परिणाम है। देखिए तो सही :सूरज भी वही, चाँद भी वही, आकाश भी वही ,धरती भी वही, नदियाँ भी वही, सागर भी वही, तारे भी वही, पेड़ पौधे भी वही,नर नारी भी वही पिछले साल वाले ; फिर नया क्या है ,जो बदल गया हो। बस समय की सुइयाँ आगे बढ़ीं और हम सबने यह मान लिया कि सब बदल गया। 

 नया वर्ष न हुआ,कोई नई दुल्हन ही आ गई ।नई दुल्हन की बात ही और है, उसका घर बदलता है,पिछला घर छूटता है ,नया वर और नए सास ससुर मिलते हैं।पुरानी सहेलियाँ, माता-पिता भाई- बहन सब पुराने पड़ जाते हैं। और नए घर मे श्वसुरालय में नए देवर जेठ ननद देवरानी और जेठानी के नए रिश्ते बन जाते हैं। नई सेज हुई तो धरती आकाश और अन्न पानी भी नए हो जाते हैं। और भी बहुत कुछ नया- नया होता है, होता है और होता रहेगा। उस नएपन को मुझे क्या बतलाना ,आप सब अनुभवी हैं। मैं भी यदि कुछ कहूँगा तो नया नहीं कहूँगा ,क्योंकि वह आपके लिए भी पुराना पड़ चुका है। कुछ लोग समय पूर्व भी उस नएपन को पुराने में बदल लेते हैं।इसके लिए तो वे ही उत्तरदायी हैं,कि उन्होंने एक दिन की नवीनता क्यों गँवाई है। यह नवीनता भी एक तरह की कमाई है, जो जिसने समय पूर्व आजमाई है ;उसके लिए तो एक कड़वी दवाई है। 

 नए के नाम पर मुझे अपना बचपन याद आता है। नयापन जीवन में नया रंग बिखेर जाता है। जब मेरे बाबा माँ पिताजी तथा चाचा जी मेरे लिए कोई नया कपड़ा सिलवाते थे ,तो मेरे लिए वह अपार हर्ष का कारण होता था।नई किताबें आने पर तो मैं नाच-नाच उठता था। नव्यता की यह भव्यता बचपन को हरा भरा बना देती थी। नएपन का भाव हमारी वृत्तियों में चंचलता लाने वाला है। इस नव्यता से भला कौन प्रभावित नहीं होता। तभी तो ईश्वरीय प्रकृति नित्य नया सवेरा लाती है। नई सन्ध्या उगाती है।प्रकृति की हर नव्यता हमें लुभाती है। 

 नयापन एक भाव है,जो हमारे मन की स्थिति पर निर्भर करता है।इसके लिए हमें अपने को उस जैसा तैयार करना पड़ता है। वर्ष भर आने वाले पर्व त्योहार हमें इसी नव्यता का संदेश देते हैं और जीवन की किरकिराती गाड़ी के पहियों में मोबिल ऑयल भर देते हैं।हमारी समस्त संचित थकान को हर लेते हुए उसे अभिसिंचित कर देते हैं। जब मैं तीसरी चौथी कक्षा का विद्यार्थी था ,मेरे पूज्य बाबा जी मेरे लिए गांधी आश्रम से मात्र 15 रुपये का एक हल्के हरे रंग का कोट मेरे लिए लाए थे। उस नए कोट को पहन कर मैं फूला नहीं समाया और आज तक उस नए कोट का गुण गाया।बड़ी ही अद्भुत है इस नए के भाव की माया। 

 पिछला कलेंडर उतर गया है। नया कलेंडर टंग गया है।इससे पूरे घर में नयापन आ गया है। और कलेंडर देने वालों के प्रति नया आभार जाग गया है।पुराने को गोल-गोल लपेट कर रख दिया है। कभी वह भी नया था। आज पुराना है। यही जीवन की नियति है। जीवन भी इसी प्रकार कभी नया होता है,फिर क्रमशः पुराना पड़ता चला जाता है। नित नव्यता का नाम जीवन है।जहाँ नव्यता नहीं ,वहाँ गाड़ी रुक रुक कर चलती है। नवीनता उसमें स्नेहन पैदा करके गति प्रदान करती है। पर इस नवीनता के लिए एक कहावत यह भी कही जाती है कि 'नया नौ दिन और पुराना सौ दिन। 'इस कहावत से तो यही लगता है कि इससे तो पुराना ही बेहतर है।जब इसे पुराना ही होना है,तो ऐसी नवीनता किस काम की ! नई बहू भी जब तक नई रहती है,सास उसे काम नहीं करने देती । बहू रहने दो ,तुम अभी नई आयी हो,मैं कर लेती हूँ। फिर तो जीवन भर तुम्हें ही करना है। बाद में बहू जब पुरानी पड़ जाती है, नएपन की बातें भी धूल में मिल जाती हैं।वह भी घूँघट छोड़कर मैक्सी पहनकर मुड़खुल्ली होकर गली भर में धमाल मचाती है।अपनी तेज आवाज की मशाल जलाती है।सास-ससुर पर ज़ुबान के बाण चलाती है।

 नएपन की एक मर्यादा है,गरिमा है, सीमा है। क्योंकि कुछ दिन बाद उसका बन जाने वाला कीमा है। खत्म हो जाने वाला है नएपन का बीमा है। नएपन से पुराणत्व इतना धीमा है, कि ज्ञात नहीं होता कि कब खत्म हो गया वलीमा है।इसलिए इस नएपन को सहेजें और संभालें ;क्योंकि वह जा रहा है। शीघ्र जाने वाला है। फिर तो पुरानेपन की ढर्रे वाली गाड़ी में ही सवार होना है।हँसना मुस्कराना तो विलीन ही है,रोना ही रोना है। जो कम है,उसे भरपूर उपभोग करें। दुरुपयोग न करें। माँस मदिरा में न जीवन जाया करें। सात्विक रहें,सात्विक ही खाया करें। नया सबको अच्छा लगता है, किन्तु सबको उसे सहेजना और सँवारना नहीं आता। अहंकार में फूल जाता है आदमी ,उसे ऊपर चढ़कर स्वयं को उतारना नहीं आता। इसीलिए तो वह नव्यता से इतराता,भरमाता और औंधे मुँह गिर जाता। शुभमस्तु ! 

 02.01.2026◆4.00प०मा० 

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