21/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
करते जो विद्रोह,संतति जननी- जनक से।
नेह न उर में मोह, उनके प्रति रहता नहीं।।
शिष्य अगर विद्रोह, करता गुरुजन के लिए।
मिले उसे नित कोह, कृपापात्र बनता नहीं।।
खाते जिसका अन्न,रहते हो जिस देश में।
तब होगे सम्पन्न, करो नहीं विद्रोह तुम।।
अगर कभी विद्रोह, मित्रों से जिसने किया।
धूल मिले व्यामोह, मर जाए वह मित्रता।।
नहीं करें विद्रोह, जिनके प्रति विश्वास हो।
नष्ट करे उर छोह, होता है किंचित अगर।।
वहाँ न रहता नेह,भरा हुआ विद्रोह से।
शेष कहाँ फिर मेह,उर में जलती आग हो।।
करे घाव सर्वत्र, भाव बुरा विद्रोह का।
मिटा प्रेम के सत्र, आग लगाए देश में।।
निकट सदा सम्बंध ,घाती का विद्रोह से।
तोड़ सभी अनुबंध,सद्भावी होता नहीं।।
रहता लेश निवास, मन में यदि विद्रोह का।
मिटे सकल विश्वास, रिश्ते जाते भाड़ में।।
करते नित विद्रोह, देशद्रोह में लिप्त हैं।
देते ही अवरोह, पले सपोले देश में।।
करें देश का नाश, करते हैं विद्रोह जो।
करें न किंचित आश, आस्तीन के साँप से।।
शुभमस्तु !
08.01.2026◆11.45 आ०मा०
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