028/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हे मानव तव मन उचटे।
रहे केन्द्र पर नित्य डटे।।
बढ़े परस्पर नेह असीम ,
मेल एकता से न हटे।
रीति सनातन भंग न हो,
उचित नहीं मनुजात खटे।
जीवन हो यह कर्म प्रधान ,
रहें मनुज से मनुज सटे।
प्रबल रखें संकल्प सभी,
रहें जगत में छटे - छटे।
एक रहें कथनी - करनी,
पल भर को मन नहीं घटे।
'शुभम्' अहं से जो है दूर,
मानवता से नहीं कटे।
शुभमस्तु !
12.01.2026●10.45आ०मा०
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