040/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पाँच अंगुलियाँ
हाथ-हाथ में
फिर भी मिलकर एक सभी।
अगर निकलना घृत
अँगुली से
जमा हुआ आसानी से
टेढ़ी पड़ती
सदा तर्जनी
नहीं कहें वे कानी से
मुक्के की
यदि पड़े जरूरत
मिल सब होतीं एक तभी।
यद्यपि सबके
काम बंटे हैं
फिर भी रहें अहं से दूर
समता नहीं
एकता छोड़ें
हेलमेल से हैं भरपूर
कोई आलस नहीं
एक पल
कहती हैं तैयार अभी।
माथे तिलक
अँगूठा करता
बड़ी बीच में खड़ी हुई
जकड़ पकड़
मजबूत पाँच की
निष्ठा से वे अड़ी हुई
असहयोग का
भाव न आता
पीछे मुड़तीं नहीं कभी।
शुभमस्तु !
21.01.2026◆10.15 आ०मा०
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