035/2026
035/2026
समांत : ईत
पदांत : अपदान्त
मात्राभार : 24.
मात्रा पतन : शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पौष-माघ में ऋतु शिशिर,जीव जंतु भयभीत।
ठिठुरन बढ़ती नित्य ही, समय बड़ा विपरीत।।
दंत-पंक्ति किट-किट बजे,थर-थर काँपे देह ।
दिन में चैन न रात को, सर- सर सरके शीत।।
कल्पवास जो कर रहे,भरे भक्ति के भाव।
भजन करें गोता लगा, मिला न कोई मीत।।
धर्म भाव यदि हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग।
पर उपदेशी लोग ये, सुना रहे हैं गीत।।
जो आता जिस काज से,करे इतर क्यों काम।
परधन कोई लूटता, समझ रहा यह जीत।।
मस्तक लगा त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य।
नर-नारी उनको लगें, बेशक भूत पलीत।।
'शुभम्' मनुज पहचानना,अति दुष्कर है राज।
भीतर से कुछ और है, बाहर संत प्रतीत।।
शुभमस्तु !
19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)
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समांत : ईत
पदांत : अपदान्त
मात्राभार : 24.
मात्रा पतन : शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पौष-माघ में ऋतु शिशिर,जीव जंतु भयभीत।
ठिठुरन बढ़ती नित्य ही, समय बड़ा विपरीत।।
दंत-पंक्ति किट-किट बजे,थर-थर काँपे देह ।
दिन में चैन न रात को, सर- सर सरके शीत।।
कल्पवास जो कर रहे,भरे भक्ति के भाव।
भजन करें गोता लगा, मिला न कोई मीत।।
धर्म भाव यदि हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग।
पर उपदेशी लोग ये, सुना रहे हैं गीत।।
जो आता जिस काज से,करे इतर क्यों काम।
परधन कोई लूटता, समझ रहा यह जीत।।
मस्तक लगा त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य।
नर-नारी उनको लगें, बेशक भूत पलीत।।
'शुभम्' मनुज पहचानना,अति दुष्कर है राज।
भीतर से कुछ और है, बाहर संत प्रतीत।।
शुभमस्तु !
19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)
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