सोमवार, 12 जनवरी 2026

अतीत का सिंहावलोकन:मेरा लेखन [ आलेख ]

 26/2026 

 

 ©लेखक 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 अपने अतीत के झरोखों में झाँकना और उसकी झाँकी कराना एक रोचक और आनन्ददायक विषय है। जीवन के विस्तार में उसके अनेक आयाम हो सकते हैं। अपने आप ही अपनी समीक्षा करना भी कोई सहज और आसान कार्य नहीं है। इस लेख में मेरा मुख्य पहलू मेरा लेखन कार्य है। यों तो कुछ भी मौलिक और सुचिंतित रूप से लिखना कोई सहज कार्य नहीं है,इसके लिए अनन्त जीवन की साधना के सोपानों पर आरोहण करते हुए व्यक्ति अपने पथ में अग्रसर हो पाता है। इसे मैं माता सरस्वती का एक असीम वरदान और कृपा ही मानता हूँ। 

 उस समय मेरी अवस्था मात्र ग्यारह वर्ष थी और मैं चौथी कक्षा का विद्यार्थी था। चौथी कक्षा के किसी विद्यार्थी से क्या कवि और लेखक होने की अपेक्षा की जा सकती है ?शायद नहीं। किंतु माँ शारदा की कृपा से ऐसा संभव हुआ और मैं कागज पर स्वेच्छया कुछ मौलिक लिख पाने में समर्थ हुआ। अंततः वह ग्यारह वर्ष की अवस्था ही क्यों रही ? यह चिंतन और मनन का विषय हो सकता है। बस इतना कहा जा सकता है कि अनेक सहित्यविदों कवियों और लेखनी के महारथियों को यह ज्ञान ग्यारह वर्ष की आयु में ही प्राप्त हुआ है। सम्भवतः प्रकृति की ऐसी देन है जो इस आयु विशेष में अंकुरित होती है। यह मानवीय बोध का श्रीगणेश है।उस समय वर्ष 1963 का वर्ष चल रहा था और मेरी कोमल हस्तांगुलियों के बीच माँ शारदा वीणापाणि सरस्वती ने लेखनी पकड़ा दी,हे वत्स!अब तुझे जीवन के पथ में अग्रसर होने के लिए काव्य और साहित्य का मौलिक सृजन करना है। तू बढ़ और आगे चल चलता रह चलता रह और कभी मत रुक।आजीवन चलता रह। यही तेरा लक्ष्य है,यही तेरा पथ है और यही तेरा गंतव्य भी है। कोई भी बाधा तुझे अनवरत आगे बढ़ते हुए रोक नहीं सकती। यह मेरा शुभ आशीर्वाद है। और फिर क्या था एक छोटी -सी बीज काव्य रचना कुछ यों प्रस्फुटित हुई:

 'सुख से रहो और प्रेम से बोलो'

 दुःख का नाम कभी मत लो। 

सत्य बोलकर मृषा मिटाओ, 

नाम असत का कभी न लो।' 

 यह पाँच छः बन्ध की अनगढ़ काव्य पंक्तियाँ मेरे लिए बीज मंत्र बन गईं। और आगरा के अपने उस छोटे से गाँव में प्रकृति के खुले दृश्यों से प्रभावित हुआ भगवत स्वरूप माँ शारदा द्वारा प्रशस्त पथ पर आगे बढ़ चला। कभी वर्षा ,गर्मी,जाड़ा , कभी सरसों गेहूँ बाजरा अरहर आदि के लहहलहते खेतों और कभी प्रकृति के विविध दृश्यों से प्रभावित होकर अपनी अनगढ़ भाषा और लिपि में कविताएँ करने लगा। उस समय तक उसे छंद लय लघु गुरु विराम यति गति आदि का कुछ भी बोध नहीं था। सब कुछ प्राकृतिक रूप में चलने लगा और अनवरत चलता रहा। आठवीं कक्षा तक आते आते उसने बहुत कुछ लिख लिया था और अब उसकी गणना आगरा क्षेत्र के बाल कवियों में होने लगी थी।आगरा शहर में होने वाले कवि सम्मेलनों के लिए उसका नाम बाल कवियों की श्रेणी में छपने लगा। उस समय लिखी गई सभी रचनाएँ उसने अपनी नोट बुक्स में लिखकर सुरक्षित कर लीं,जिन्हें वह अपनी चौपाल पर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर अपने परिचित मित्रों चाचाओं और भाई बंधुओं को सुनाने लगा। उन सभी श्रोताओं के लिए मेरा काव्य लिखना किसी सातवें आश्चर्य से कम नहीं था। 

 कक्षा आठ उत्तीर्ण करते -करते मैंने अपने चाचाजी की अलमारी में रखीं हुई हिंदी साहित्य की मोटी मोटी पोथियाँ रुचिपूर्वक पढ़ डालीं। जिनमें मुख्यतः प्रिय प्रवास,साकेत,कामायनी, कबीर, सूर सागर, मुंशी प्रेमचंद के गोदान आदि उपन्यास और भी न जाने क्या क्या ,पढ़ डाले थे।उसी समय घर पर आने वाला बहुत सारा साहित्य पत्र पत्रिकाओं के रूप में आता था। पढ़ने के प्रति गहन रुचि होने के कारण कुछ भी अनपढा मेरी दृष्टि से बच नहीं सका। मेरे द्वारा बौद्ध साहित्य का गहन अध्ययन उसी कालावधि में किया गया। जिससे प्रेरित होकर हाई स्कूल के बाद वृहदाकार 'तपस्वी बुद्ध' महाकाव्य का प्रणयन भी हो गया। जो न जाने कितने प्रकार के छंद बहुल रूप में एक लगभग 275 पृष्ठों की कृति के रूप में 2018 में प्रकाशित हुआ। 

 जहाँ तक मेरे लेखन के प्रकाशन की बात है ,राजकीय इंटर कालेज आगरा में विज्ञान वर्ग में अध्ययन करते समय मुझे कालेज पत्रिका में रचना प्रकाशित कराने का प्रथम सुअवसर प्राप्त हुआ और मेरा वैज्ञानिक लेख 'वृत्ताकार या पहिया' प्रकाशित हुआ। उसके बाद तो मैं अनेक पत्र पत्रिकाओं के संपर्क में आया और तत्कालीन समाचार पत्रों 'सैनिक' ,'विकासशील भारत' आदि में मेरे लेख और अन्य रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। उस समय जीवनी मंडी आगरा से दैनिक 'सैनिक' के संपादक श्री प्रेमदत्त पालीवाल जी के संपादकत्व में प्रकाशित 'युवक' मासिक पत्र में मेरी कविताएँ, कहानियाँ,व्यंग्य लेख, एकांकी और निबंध प्रकाशित होने लगे जो दीर्घ अवधि तक छपते रहे। यह पत्रिका एक 40-50 पृष्ठों की बड़ी पत्रिका होती थी। उसी कालावधि में मेरी काव्य रचनाएँ बीकानेर राजस्थान से प्रकाशित होने वाली स्वास्थ्य पत्रिका 'शुचि' में भी प्रकाशित होने लगीं।

 इस प्रकार मेरा लेखन कार्य गतिमान हुआ और मैं लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ता रहा। आगरा विश्वविद्यालय आगरा से 1973 में बी०एस सी० ; 1975 में एम०ए०(हिंदी ) और 1978 में पी एच०डी० की उपाधियाँ प्राप्त करने के बाद 1980 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बीसलपुर (पीलीभीत )में हिंदी प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति मिली। राजकीय व्यवस्था के क्रम में मेरा स्थान्तरण अक्टूबर 1983 में राजकीय महाविद्यालय जलेसर (एटा) के लिए हुआ। 1990 में पुनः पूर्व महाविद्यालय में बीसलपुर के लिए स्थानांतरण हो गया।जहाँ मुझे रहने लिए माता जी श्यामादेवी जी का वही मकान रहने लिए मिला ,जिसमें मैं 1980 से 1983 तक रहा था। उसी अंतराल में माताजी ने रामचरितमानस का अखंड पाठ का 24 घण्टे का आयोजन किया,जिसमें मानस पाठ करने का सुअवसर मुझे भी प्राप्त हुआ।यह मानस पाठ मेरे मन में कुछ इस तरह रच बस गया कि एक सप्ताह में ही अपना प्रथम हास्य व्यंग्य काव्य 'श्रीलोकचरित मानस' पूरा कर डाला ,जो 1992 में ही बीसलपुर से प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष मेरी पूजनीया माँ का स्वर्गवास हो गया। सूचना मिलने पर गाँव गया तो मुझे माँ के दर्शन नहीं हो सके। उनके उस शोकावेग में मात्र तीन दिन में ही खंडकाव्य 'बोलते आँसू' लिखा गया जो वर्ष 1993 में प्रकाशित हुआ। सात वर्ष तक मेरी कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। सात वर्ष के बाद वर्ष 2000 में आगरा से मेरी अनगढ़ गजलों की कृति 'स्वाभायनी' प्रकाशित हुई। 

 जब मैं एम०ए० (पूर्वार्द्ध) का छात्र था; मैंने 23 सितंबर 1974 की रात को एक स्वप्न देखा जिसमें मेरे गाँव का ही एक व्यक्ति चाँदनी रात में ताजमहल के भवन पर आरोहण कर रहा है ,उसे ऐसा करते देख मैं भी उसका अनुसरण करने लगता हूँ और इसी प्रयास में स्वप्न भंग हो जाता है। सुबह की वेला है और मैं एक कविता शृंगार छंद में लिख देता हूँ,जिसका शीर्षक है 'प्रेम'। इस रचना को लिखने के बाद मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस पर अभी बहुत कुछ लिखा जा सकता है,और फिर क्या मेरी लेखनी पत्र पटल पर चलने लगती है और मात्र तीन दिन में ही एक नवीन खंडकाव्य 'ताजमहल' खड़ा हो जाता है। यह खंडकाव्य वर्ष 2008 में अमृत प्रकाशन शाहदरा दिल्ली से प्रकाशित हुआ। वर्ष 2008 में ही मेरा एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास 'ग़ज़ल' भी उसी प्रकाशन से प्रकाश में आया। यद्यपि मेरा शोध कार्य 1978 में ही मुझे डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान कर चुका था,किंतु उसका प्रकाशन भी 2008 में ही कानपुर से संभव हो सका। 

 मेरा हास्य व्यंग्य काव्य 'सारी तो सारी गई' वर्ष 2009 में और ग़ज़ल संग्रह 'रसराज' 2011 में अमृत प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। 2016 में मेरे पूज्य पिताजी हमें छोड़कर स्वर्गलोक की लंबी यात्रा पर निकल गए और हम अनाथ हो गए। इसका मुझे माँ से विलग होने के समान ही अत्यधिक दुःख हुआ,जिसे मैंने अपने 'फिर बहे आँसू' खण्डकाव्य में आँसुओं के रूप में बहाया। यह वर्ष 2018 में कानपुर से प्रकाशित हुआ। वर्ष 2018 में ही वर्ष 1974 में लिखा गया महाकाव्य 'तपस्वी बुद्ध' सहित्यपीडिया नोयडा से प्रकाशित हुआ। 

 वर्ष 1998 से मैं सिरसागंज के जिस क्षेत्र में निवास करते हुए राजकीय सेवा कर रहा था, वह एक आलू उत्पादक बहुल है ,जिसके आलू का उत्पादन देश ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है। मेरे आगरा स्थित गाँव पुरा लोधी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है,जहाँ 99% प्रतिशत किसान आलू का उत्पादन करते हैं। जब मैं सिरसागंज से गाँव जाता तो जहाँ भी चार आदमियों को बैठा हुआ पाता ,वहाँ आलू- चर्चा की ही प्रमुखता से सुनता। इससे प्रभावित होकर आलू शतक लिखा गया और बहुत सारे बालगीतों के साथ एक वृहदाकार काव्यकृति 'आओ आलू आलू खेलें' 2020 में ही कानपुर से प्रकाशित हुई।

 व्यंग्य लेखन मेरी बचपन से ही आजमाई हुई प्रिय विधा है। जिस पर कभी लेखन कार्य बंद नहीं हुआ। क्या गद्य और क्या पद्य सभी में अनेक व्यंग्य रचना विधान अनवरत जारी रहा। तब वर्ष 2020 में ही मेरी व्यंग्य की प्रथम कृति 'शुभम् व्यंग्य वातातन' आगरा से प्रकाशित हुई। वर्ष 2022 में देव स्तुति काव्य के रूप में 'शुभम् स्तवन मंजरी' लखनऊ से प्रकाशित हुई।

 2022 से प्रकाशन का यह क्रम थमा नहीं ,बल्कि शुभदा प्रकाशन ,जांजगीर (छत्तीसगढ़) में प्रकाशन ने अपना ध्वज फहराया और मेरी चौदहवीं कृति 'विधाता की चिंता' वहाँ से प्रकाशित हुई। इसी वर्ष वहाँ से 'शुभम् गीत गंगा' प्रकाशित हुई। मेरी 16वीं पुस्तक 'शुभम्' कुण्डलियावली' आगरा से प्रकाशित हुई। उसके बाद शुभदा प्रकाशन छत्तीसगढ़ ने शुभम् साहित्य सृजन की शृंखला को अंगीकृत कर लिया कि 2025 तक मेरी 44 साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं ,जिनमें वर्ष 2022 में तीन, 2023 में सात,2024 में सात ,2025 में चौदह कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं। अब तक 2026 में सृजनांक:45, 46,47 और 48 प्रकाशित हो चुकी हैं ;जिनके नाम क्रमशः 'इंद्रधनुष मेरी बाँहों में' , 'इंद्रधनुष के रंग' , 'हम तुम दीप जलाएँ' और नवगीत संग्रह 'अँखुए' हैं। इसके बाद 'वल्लरी' (नवगीत संग्रह), 'पंच विधांगिनी' , और 'शुभम् शब्दोत्सव' (लेख व संस्मरण संग्रह) कुल 51 कृतियों की फरवरी 2026 तक प्रकाशित करने की योजना है। 51 कृतियों का सृजन और प्रकाशन पूर्ण होने के बाद यह सृजन और प्रकाशन का पावन कर्म मुझे किस ओर ले जाए, मैं इससे सर्वथा अनभिज्ञ हूँ। बस परम पिता परमात्मा से यही प्रार्थना है कि जिन्होंने मुझे एक दिशा दी है ,दृष्टि दी है, वह मेरी भावी दिशा और गंतव्य के निर्धारक होंगे। ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है। शुभमस्तु !

 12.01.2026◆9.45 आ०मा०

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