शनिवार, 24 जनवरी 2026

मादक मृदुल बहार [ सोरठा ]

 043/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आने      लगी   बहार,पौष-माघ   जाने   लगे।

 कोमल     रश्मि   उदार,  सूर्यदेव बरसा रहे।।

कोयल के मधु  बोल, खिलतीं  कलियाँ बाग   में।

 रँगरलियां    रस   घोल,   बरसें   नई बहार की।।


  मादक मृदुल बहार, सरसों   फूली  खेत    में।

 सुमन    स्रवित  रसदार,भ्रमरावलि गुंजारती।।

नव    पाटल     के  फूल, क्यारी  में गेंदा खिले।

कलियाँ शाख  बबूल, खिलतीं नवल बहार की।।


 यौवन    एक   बहार,  मानव   जीवन के लिए।

खुलें  प्रगति  के द्वार, उर में  खिलते फूल - से।।

उठता   उर उल्लास, जब   बहार   हैं झूमतीं।

चमके  नवल    उजास,जीवन   में  आंनद  हो।।


ज्यों कोकिल के बोल,  निर्मल  विरुद बहार का।

तन -मन में   रस  घोल,  कुहू - कुहू अंतर करे।।

आती    सघन   बहार,   षोडशियों  की   देह में।

बहे   रसों   की   धार,  अंग- अंग    नित झूमता।।


कलियाँ   करें  पुकार,   आता  है मधुमास जब।

भरती   विमल  बहार,कण- कण में नव   चेतना।

टर्र -टर्र      उच्चार, पावस   ऋतु  जब आ   गई।

छाने लगी बहार,    करते    मेढक   ताल   में।।


वन-वन    फूले   ढाक,  फागुन   की रंगीनियाँ।

भ्रमर   रहे    हैं ताक,  है बहार - गरिमा बड़ी ।।


शुभमस्तु !


21.01.2026◆ 7.15 प०मा०

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