सोमवार, 12 जनवरी 2026

संपादक जी ! [ व्यंग्य ]

 23/2026 

 

 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 वे हिंदी साहित्य के बहुत बड़े संपादक जी हैं। उन्होंने अब तक पचास साझा काव्य संग्रहों और पचास पुस्तकों का संपादन किया है। किसी पुस्तक का संपादन करने के लिए उनके पास सम्पादन की विशेष तकनीक है।यदि किसी को जल्दी से जल्दी वरिष्ठ कवि या वरिष्ठ साहित्यकार बनना हो तो अनंत चौमुखी जी से सम्पर्क करे। वे किसी को भी रातों रात कवि बनाने की क्षमता रखते हैं। यह तो आप जानते ही हैं कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। तो आपको भी कुछ ज्यादा कुछ नहीं खोना पड़ेगा। यही कि बस हाथों का कुछ मैल।बस हाथों के इस न कुछ मैल के उनसे मेल होते ही आप मेल की तरह दौड़ने लग जाएँगे। मैल भी तो आपके पसीने से बनना है। एक बार थोड़ा छुड़ाकर और बहा लेना और अपने मैल-भंडार को समृद्ध कर लेना। 

 अपने न कुछ मैल को पेटी एम के पेट में निगलवाईये और कुछ उलटा- सीधा लिखकर उनके पास भिजवाईये। बस रातों रात 'काव्य धुरंधर' , 'काव्य सम्राट', 'कविकुल कोकिल' , 'कवि हस्ती' ( 'कवि हस्तिनी' भी), 'कवि अश्व' ( 'कवि गर्दभ' की उपाधि देना बंद कर दिया है।) ; 'कवि चातक' ,'कवि मयूर' आदि अनगिनत उपाधियों से अलंकृत हो जाइए। चौमुखी जी अनासक्त भाव से रचनाओं को ग्रहण करते हैं और जैसे भिखारी दाल, चावल, गेहूँ ,जौ, चना,मटर, सरसों, ज्वार ,बाजरा ,मक्का, तिल, राई, मूँग,उर्द, अरहर,मसूर आदि सबको एक ही झोली में भर लेता है और बाद में एक ऐसा मिश्रण तैयार करता है,जो यदि किसी को लाभान्वित न करे तो हानिकारक भी न हो। यह सब कुछ आपके हाथों के मैल की गुणवत्ता और मात्रा पर निर्भर करता है कि आप किस उपाधि के लायक सपूत हैं। एक वार्षिक, द्वि वार्षिक, पंच वार्षिक या आजीवन मैल दान आपके वर्चस्व और सम्मान में चार चाँद लगा देता है। बाद में ससम्मान आपकी कृति,शॉल, सम्मान पत्र, प्रतीक चिन्ह डाक द्वारा आपको हस्तगत हो जाता है। आपको चार कदम देह हिलाने की भी आवश्यकता नहीं है। और अगले दिन देखिए कि सोशल मीडिया, अखबारों और टीवी पर आप ही आप सुर्खियों में छाए मिलेंगे।

 यह देश गुणियों से रिक्त नहीं है। ऐसे तमाम संपादक साहित्यकार हैं,जिन्होंने अपने जीवन में किसी चींटे को भी स्याही में डुबाकर कागज पर नहीं छोड़ा और आज केवल और केवल संपादन के बल पर ही करोड़ों में खेलते हुए देश नहीं ,दुनिया के अंतरराष्ट्रीय साहित्यकार हैं। कुछ सहित्यविद् ऐसे भी हैं,जो केवल व्हाट्सअप ग्रुप के एडमिन बनकर ही विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार बन गए। भानुमती का कुनबा जोड़ना भी कोई मामूली काम नहीं है। इसके लिए मोबाइल नहीं, फिक्साइल चाहिए ,जो उनके कान में और उनके काम में ऐसे चिपका रहे कि जैसे उसकी प्लास्टिक सर्जरी कर दी गई हो।

 ऐसे गुणी संपादक जीओं के कारनामों से वास्तविक कवि और लेखक ऐसे थर थर थरथरा रहे हैं,जैसे पूस माघ की ठंड में बुड्ढे बुढ़ियाँएं। वे मौन होकर भौंन के कौने में दुबक गए हैं कि असली सोने को कोई पूछ नहीं रहा और नकली सोना खरगोश बना हुआ मैराथन की दौड़ में बाजी मार ले गया है। वे ठगे से मुँह ताक रहे हैं। और देख रहे हैं कि किसी कवि सम्मेलन का न्योंता उन्हें भी मिल जाए ,पर ये चौमुखी जैसे नवोदित संपादक जी उन्हें जिंदा रहने दें तब न ! फ़सलियों और नकलियों ने असलियों की अस्मत पर दिन दहाड़े डाका डाला है।जानने वाले जान रहे हैं, समझने वाले समझ रहे हैं,पर किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि अंततः करें तो क्या करें। कुछ नवोदित कवि तो ऐसे भी भी सेंधमारी करते हुए पकड़े गए हैं,जो केवल स्वचोरित काव्य से ही 'काव्य ताम्रचूड़ ' बन गए। और जगह- जगह बांग देते फिर रहे हैं कि उनकी कविता पचास साझा संग्रहों की शोभा बढ़ा चुकी है। 

 अंत में सरस्वती माँ से यही प्रार्थना है कि कवियों और साहित्यकारों को इतने बुरे दिन भी न आएं कि उन्हें इन संपादकों की शरण में चप्पलें घिसनी पड़ जाएँ। उनका यह धंधा उन्हें ही फले- फूले जो किसी के हाथ के मैल को चाट कर इतने ऊले कि आज पायजामे से बाहर हुए जा रहे हैं और साहित्य जगत को ठेंगा दिखा रहे हैं। इनके लिए साहित्य और सहित्यकार बनने का लोभ एक लघु उद्योग बनकर सामने आया है और असली साहित्य को चूँ चूँ के मुरब्बे ने ठेंगा दिखाया है।नकली सोने में असली सोने से चमक होती भी ज्यादा है। 

 शुभमस्तु ! 

 08.01.2026◆4.30प०मा०

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