शनिवार, 3 जनवरी 2026

झूठ बोलना पाप है? [ आलेख ]

 007/2026

 

 ©लेखक 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 बचपन में हम लकड़ी की काली पट्टी पर कक्षा कच्ची एक, पक्की एक, दो और तीन में लिखा करते थे। उस समय हमारा लेख सुधारने के लिए काँच के घोंटे से घोंटी गई दर्पण जैसी चमचमाती पट्टी पर सुलेख लिखवाए जाते थे ,जिसे हम सरकंडे की कलम से दावात में घुली हुई खड़िया से सजा -सजा कर लिखा करते थे।हमारे गुरुजनों द्वारा श्यामपट पर कोई एक वाक्य लिख दिया जाता था,जिसे बार -बार दोहराते हुए उस पट्टी पर सुंदर अक्षरों में लिखा जाता था और वाहवाही प्राप्त की जाती थी। सुलेख के लिए लिखवाए जाने वाले वाक्यों में प्रायः यह भी लिखवाया जाता था कि झूठ बोलना पाप है। इस वाक्य को लिखने से हमें दो लाभ होते थे,पहला यही की लेख सुधरता था और एक संस्कार बनता था और दूसरा यह कि झूठ नहीं बोलना चाहिए,यह पाप होता है। बचपन का वह संदेश आज भी याद है और संस्कार बन गया है। एक अच्छी सीख दे गया है।

 आज सोचते हैं कि जब झूठ बोलना पाप होता है,तो आज भी होता होगा। इसके विपरीत यदि सोचा जाए तो झूठ न बोलना अर्थात सत्य बोलना पुण्य होना चाहिए। किन्तु ऐसा कभी पढ़ाया या बताया नहीं गया। ऐसा अंडरस्टूड मान लिया जाता होगा। जब झूठ बोलना पाप ही है,तो आदमी इतना झूठ बोलता ही क्यों है ? जब झूठ बोलना पाप है तो सत्य बोलना पुण्य होना ही चाहिए। पर उस पुण्य के प्रति आदमी की उतनी अभिरुचि क्यों नहीं है,जितनी पाप के प्रति है।

 झूठ बोलने वालों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। जब वे जानते हैं कि वे पाप कर रहे हैं तो पाप क्यों कर रहे हैं। शायद इसलिए कि उन्हें धोने के लिए सारे देश में गंगा यमुना नर्मदा कावेरी आदि पवित्र नदियाँ पहले से ही विद्यमान हैं। वहाँ जाइए ,गोता लगाइए और पाप ताप से हल्के होकर लौट आइए। फिर झूठ बोलिए और गङ्गा की एक डुबकी में सब साफ। एकदम निर्मल और दूध जैसा तन भी और मन भी और पुनः पाप करने के लिए रिफ्रेश। ज्यादा पाप एकत्र हो जाएँ तो छः साल बाद अर्द्ध कुम्भ और बारह साल बाद महाकुंभ में प्रक्षालित करने से भला किसने रोका है। ये नदियाँ और कुंभ तो हर आम और खास जैसे नेता, कर्मचारी, अधिकारी, व्यापारी, सरकारी ,अर्द्ध सरकारी या गैर सरकारी ,मिलावटखोर,चोर, डकैत, दिन के डकैत और रात के डकैत ; सबकी समान भाव से सेवा कर ही रही हैं। वे उन पापों को समुद्र में गिराकर खारी बना डालती हैं और सागर भी उन पापों को बादलों को सौंप देकर वर्षा ऋतु में पुनः खेतों में बरसा देता है और जिन्होंने जो पाप नदियों में बहाए थे,उन्हें पुनः प्राप्त हो जाते हैं।और पाप के आदान प्रदान का संतुलन पूरा हो जाता है। यही कारण है कि आदमी पापों के अर्जन में कोई कमी नहीं करता और झूठ बोलने झूठे काम करने आदि में संलिप्त रहता है। उसे शर्म इसलिए नहीं आती ,क्योंकि यही तो उसके जीवन जीने का ढर्रा है,शैली है, प्रणाली है। इससे बचकर या विमुख होकर जी भी कैसे सकता है।

 आजकल स्कूलों में शायद यह नहीं पढ़ाया जाता कि झूठ बोलना पाप होता है। किंतु जब कोई चीज जीवन में रस बस जाए तो उसे कोई स्कूलों में क्यों पढ़ाए ! अब आदमी के जीवन में झूठ रस बस गया है। वह सबके लिए कॉमन है। जो झूठ से दूर है ,वह गरीबी की मार से चकनाचूर है।जो झूठ के जितने पास है ,उसमें उतना ही उल्लास है। वह ख्याति के शिखरों में खास है। उसी के झूठ की अखबारों में 'सुवास' है। कितने ही जज ,वकील,नेता,मंत्री झूठ के धनार्जन में पकड़े जाते हैं,अखबारों में उनके नाम सुर्खियों में आते हैं,किन्तु कुछ दिन के बाद उन्हें लोग भूल जाते हैं।रिश्वत लेने वाले रिश्वत देकर साफ निकल जाते हैं। जिधर देखिए झूठ का चमत्कार है। तो स्कूल में मास्टर जी या मेडम जी क्यों पढ़ाएँ कि झूठ बोलना पाप है। यह झूठ ही है जो सारी कमाई का बाप है। सत्यवादियों को भला कौन घास डालता है। उनकी संख्या हाथ की अँगुलियों पर भी गणनीय नहीं है। 

 विकास में कमीशन की अहं भूमिका है। किंतु कमीशन को कोई झूठ की संतान नहीं कहता। मंत्री अधिकारी सब उसी के आसरे अपनी कुर्सी बचाये हुए हैं।यदि कमीशन न होता तो विकास भी न होता। सौ में से साठ तो कमीशन की भेंट चढ़ जाता है। ये देश इस कमीशन से ही विकास कर रहा है। एक साइकिल छाप विधायक मंत्री बनते ही अरबों का मालिक होता है। मैं न कहूँ तेरी तू न कह मेरी। जिसकी भी दुम उठती है ,वह निकलता मादा ही है। बस देरी इस बात की है कि किसकी पूँछ कब उठे। सत्य बोलना पुण्य होता है,यह वाक्य हमारे संस्कार और शिक्षा के कोर्स से बाहर का विषय है। जब कोई सत्य को जानता ही नहीं और जानना भी नहीं चाहता तो करेगा वही जो परम्परागत रूप से करता और देखता आ रहा है। 'सत्यमेव जयते' का नारा केवल लिखने भर के लिए है। वस्तुतः 'झूठमेव जयते' ही अंगीकृत ,अधिनियमित और जीवन में संचालित है। अब न पट्टियां रहीं न पट्टियों पर लिखवाने और लिखने वाले रहे। अब तो बच्चा नर्सरी से ही बॉल पैन और नोटबुक थाम लेता है। उसे इमला या सुलेख लिखना नहीं सिखाया जाता। झूठ बोलना पाप है, की बात उसका संस्कार कैसे बन सकती है। अब तो जो जितना झूठ पर निर्भर है, वह उतना ही उर्वर है, उतना ही सफल है।

 शुभमस्तु ! 

 02.01.2026◆10.00 प०मा०

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