शनिवार, 24 जनवरी 2026

अंबर नीला सागर नीला [ नवगीत ]

 044/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंबर नीला

सागर नीला

धरा धरातल धूसर-धूसर।


नीले ने

व्यापकता बो दी

सारा जगत समाया है

दृष्टि पड़े जो

दृग अंचल की

तृप्त भाव भर आया है

भू पर 

हरे पेड़ लतिकाएँ

कहीं पड़े हैं सूखे ऊसर।


अंबर मौन

मौन ही सागर

कभी-कभी करता गर्जन

मौन पड़ी

सहती सब धरती

कभी नहीं करती वर्जन

सहनशीलता की

वह शिक्षक

और नहीं ऐसा दूसर।


रंग-रंग के

दृश्य धरा पर

नील गगन में शशि तारे

दिनकर करे

उजाला दिन में

जाग्रति के  गूँजें  नारे

सागर के तल में

मुक्तामणि

चमक बिखेरें निज ऊजर।


शुभमस्तु !


22.01.2026◆11.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...